हिन्दी की कमर टूट जाएगी…

  • भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह मिली तो हिन्दी की कमर टूट जाएगी…
    डॉ. अमरनाथ

हमारी हिन्दी आज टूटने के कगार पर है. कुछ स्वार्थी लोगों ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग तेज कर दी है. भोजपुरी क्षेत्र के दो माननीय सांसदों ने संसद में फिर से यह माँग की है. पिछले 8 अगस्त और इसके बाद 15 नवंबर को इस माँग के समर्थन में दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दिया गया. ‘जन भोजपुरी मंच’ नामक संगठन के लोग हमारे प्रधान मंत्री श्री मोदी जी को इस आशय का संदेश भेजकर उनपर अपना दबाव बना रहे हैं. दुख इस बात का है कि 11नवंबर 2016 को हमारे गृहमंत्री माननीय राजनाथ सिंह ने भी लखनऊ की एक सभा में बयान दे डाला कि भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूची मे शामिल किया जाएगा. इतने गंभीर मुद्देपर बयान देने से पहले कम से कम उन्हें देश के प्रतिष्ठित भाषा वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, साहित्य अकादमी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से सुक्षाव अवश्य ले लेना चाहिए. सिर्फ चुनाव में वोट के लिए हिन्दी और हिन्दी समाज को विखंडित और कमजोर करने वाले बयान भाजपा जैसी विकास की पक्षधर और राष्ट्रवादी पार्टी की प्रकृति के सर्वथा प्रतिकूल है. हम माननीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह से आग्रह करते हैं कि वे अपने बयान पर पुनर्विचार करें. संविधान की आठवी अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से राजभाषा हिन्दी को जो क्षति होगी उसका संक्षिप्त विवरण हम क्रमबद्ध रूप में यहाँ दे रहे हैं.-
1. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी भाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या घट जाएगी. स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिन्दी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं है.
2. ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिन्दी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिन्दी का स्थान दूसरा रहता था. हिन्दी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूँढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है. साम्राज्यवादियों द्वारा हिन्दी की एकता को खंडित करने के षड़्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.
3. हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है. अंग्रेजी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. उसके सामने हिन्दी ही तनकर खड़ी हो सकती है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेजी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?
4. भोजपुरी की समृद्धि से हिन्दी को और हिन्दी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बाँट लेना है. भोजपुरी तब हिन्दी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिन्दी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? क्योंकि तब कबीर हिन्दी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाय?
5. भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की ?
6. कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बँटने से लोग कमजोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिन्दी भी. हमारे भीतर हीनताबोध बढ़ेगा. इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिन्दी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.
7. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थान दिलाने की माँग आज भी लंबित है. यदि हिन्दी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?
8. संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भोजपुरी को माध्यम भाषा के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा और भोजपुरी के साहित्य को भी एक विषय के रूप में रखना पड़ेगा. परीक्षक भी भोजपुरी के विद्वान ही होंगे. ऐसी दशा में मूल्यांकन में परीक्षकों के भीतर क्षेत्रीयता का भाव विकसित होगा और अखिल भारतीय सेवाओं के लिए चयनित होने वाले लोक सेवकों का स्तर गिरेगा.
9. भोजपुर राज्य की मांग को बल मिलेगा और हिन्दी क्षेत्र के और अधिक टुकड़े होंगे. मिथिलाँचल की मांग होने लगी है. अलग राज्य बनने से होने वाला खर्च जनता को ही वहन करना पड़ेगा. उल्लेखनीय है कि विकास सुशासन से होता है छोटे या बड़े राज्य बनने से नहीं. हां, इससे नेताओं की जमात और तैयार हो जाएगी जिसका खर्ज जनता को ही वहन करना पड़ेगा..
10. ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिन्दी की रोटी खाते हैं और मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की माँग कर रहे हैं, ताकि उनके आस पास की जनता गँवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे. क्या मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई भोजपुरी में कराना संभव है? तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक राजभाषा हिन्दी में भी उनकी पढ़ाई करा पाने में हम सफल नहीं हो सके.
11. हमें देखना होगा कि इसकी मांग करने वाले कौन लोग हैं. कुछ नेता, कुछ अभिनेता और कुछ बोलियों के साहित्यकार. जिन साहित्यकारों को उनकी हिन्दी कृतियों की स्तरहीनता के कारण प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी उन्हें भोजपुरी में लिखने के लिए तरह तरह के पुरस्कार जरूर मिलने लगेंगे क्योंकि वहाँ कोई प्रतियोगिता नहीं होगी. अभिनेताओं को उनकी फिल्मों के लिए पैसे व प्रतिष्ठा दोनो मिलेगी और नेताओं को वोट, जिसे अपनी भोजपुरी की मान्यता के नाम पर इस क्षेत्र की सीधी सादी जनता भावनाओं में बहकर दे देगी. किन्तु हिन्दी क्षेत्र की आम जनता को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, इसका आकलन कर पाना भी संभव नहीं है,.
12. स्वतंत्रता के बाद हिन्दी की व्याप्ति हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिन्दी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिन्दी भाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिन्दीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिन्दी का संख्या-बल घटा तो वहाँ की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहाँ हिन्दी के पाठ्यक्रम जारी रखे जायँ या नहीं. इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय अथवा विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.
निष्कर्ष यह कि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.
हम माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी तथा माननीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह जी से आग्रह करते हैं कि हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न करे और इस विषय में यथा स्थिति बनाए रखें.
हम अपने देश के प्रबुद्ध नागरिकों, साहित्यकारों, राष्ट्र भक्तों और हिन्दी प्रेमियों से भी आग्रह करते हैं कि टुकड़े टुकड़े होकर विखरने के कगार पर खड़ी हिन्दी को बचा लें. आज हम सबका दायित्व है कि हिन्दी को विखरने से बचाने के लिए अपने प्रधान मंत्री जी तथा गृहमंत्री जी को लिखें, उन्हें ट्वीट करें और जिस भी तरह से संभव हो हिन्दी की शक्ति को बचाने के लिए लामबंद होकर संघर्ष करें.
हमारी कोई मांग नहीं है. हम इस विषय में सिर्फ यथास्थिति बनाए रखने का आग्रह भर कर रहे हैं.

डॉ. अमरनाथ
संयोजक, हिन्दी बचाओ मंच
ई-मेल: amarnath.cu@gmail.com मो: 9433009898

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गुलाम मानसिकता और हिंदी का ‘राजयोग’ …

  • श्याम रुद्र पाठक

हिंदी भारत के गुलामों की भाषा है | हिंदी कुली-कबाड़ियोंं और मजदूरोंं की भाषा है | कहने के लिए हिंदी भारत के केंद्र सरकार की राजभाषा है | परन्तु हिंदी का प्रयोग भारत के उच्चतम न्यायालय में प्रतिबंधित है | हिंदी का प्रयोग दिल्ली, झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के उच्च न्यायालयों में प्रतिबंधित है | हिंदी का प्रयोग आईआईएम और NLU की प्रवेश परीक्षाओं CAT और CLAT में प्रतिबंधित है | हिंदी का प्रयोग UPSC की अधिकांश प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रतिबन्धित है | निम्न स्तर के कर्मचारियों के चयन के लिए एसएससी द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अंग्रेज़ी भाषा का अधिभार 62.5 % तक है, जबकि हिंदी भाषा का अधिभार शून्य प्रतिशत है |

हे भारत के गुलामो ! तुम हो तो गुलाम, लेकिन आज़ाद होने के भ्रम में जीते हो | तुम गुलाम थे, गुलाम हो और गुलाम ही रहोगे | रहने दो यह सब तुम से नहीं हो पाएगा | तुम बिना कुछ किए हुए आजादी हासिल करना चाहते हो | क्या पिछले इकहत्तर साल में तुमने एक बार भी इस बात के लिए कोई आन्दोलन किया कि न्यायालयों और प्रतियोगिता परीक्षाओं में हिंदी के ऊपर लगा प्रतिबन्ध समाप्त हो ? नहीं | तुम्हें तो केवल मतलब है मंचों पर हिंदी के नाम पर सम्मान हासिल करने में | हिंदी के लिए लोहिया जी के समय जो आन्दोलन हुआ भी, उसका स्वरूप क्या था ? तुम अंग्रेज़ी के नाम पट्ट और साइन बोर्ड पर कालिख पोतते थे | अरे कालिख पोतने से क्या होगा ? अगर प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता रहेगी तो क्या हिंदी में पढ़ने वाले छात्र उच्च शिक्षा में प्रवेश कर सकेंगे या क्या वे नौकरियाँ हासिल कर सकेंगे ? कौन अभिभावक अपने बच्चों का इतना बड़ा दुश्मन होगा जो यह चाहेगा कि उसका बच्चा अंग्रेजी की बजाए हिंदी में पढ़े और विकास के अवसरों से वंचित रहकर कुली-कबाड़ी और मजदूर बनने के लिए मजबूर रहे ? लोहिया जी के अनेक चेले केन्द्रीय मंत्रिमंडल में अनेक साल तक रहे | परन्तु उन लोगों ने कभी भी प्रतियोगिता परीक्षाओं और न्यायालयों में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता हटाकर भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध करवाने की बात नहीं की | क्यों करें ? उनको तो अंग्रेज़ी के नाम-पट्ट और साइन-बोर्ड पर कालिख पोतने से मतलब था, सो पोत लिया |

हिंदी के नाम पर अलग-अलग सम्मेलनों में शेखी बघारने वाले लोग कभी भी विकास के अवसरों में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता हटाने के लिए धरना-प्रदर्शन करने या जेल जाने के लिए तैयार नहीं होते | उन्हें तो मतलब है बंद हॉल में भाषण झारने और उसके लिए चन्दा इकट्ठा करने से |

रहने दो | यह सब तुम से नहीं हो पाएगा | तुम गुलाम थे, गुलाम हो और गुलाम ही रहोगे | कभी भी मृग खुद दौर कर सोए हुए सिंह के मुँह में नहीं आ जाता | तुम उसी भ्रम में जी रहे हो | अब तुम अपनी गुलामी क़ुबूल कर लो और हिंदी को लात मारो | अपने बच्चों को अंग्रेज़ी में पढ़ाओ |

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कहीं चिंदी-चिंदी हो बिखर न जाए हिंदी, इसलिए लड़ रहे हैं ‘अपनी भाषा’ के लोग…

देश-दुनिया के तमाम हिंदीप्रेमी 15 जनवरी 2017 को नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले के आखिरी दिन मेलार्थी होने का सुख ले रहे थे. उसी समय प्रगति मैदान से महज चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित जंतर मंतर पर हिंदी कहीं चिंदी-चिंदी न हो जाए, इसलिए कुछ हिंदीप्रेमी धरना दे रहे थे.

यह धरना ‘अपनी भाषा’ और ‘हिंदी बचाओ मंच’ के माध्यम से आयोजित हुआ. दरअसल सांसद मनोज तिवारी, संजय निरुपम, जीतन राम मांझी आदि द्वारा भोजपुरी, राजस्थानी, मगही आदि को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के बयान सामने आने के बाद हिंदी के चिंतकों और लेखकों में इसे लेकर गंभीर असहमति है.

इस असहमति की परिणति कल जंतर मंतर पर धरने के रूप में हुई. इस धरना प्रदर्शन में वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा :

‘‘भोजपुरी और राजस्थानी समेत हिंदी की किसी भी बोली को आठवीं अनुसूची में शामिल न करें और हिंदी को टूटने से बचाएं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब हिंदी का संघर्ष अंग्रेजी के वर्चस्व की मानसिकता के खिलाफ मजबूत हो रहा है ठीक उसी समय हिंदी की बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के नाम पर अंदरूनी कलह को जन्म दिया जा रहा है. इससे हिंदी कमजोर होगी.’’

जानी-मानी साहित्यकार चित्रा मुद्गल ने कहा कि भोजपुरी हिंदी का अभिन्न हिस्सा है, इसे अलग कर देने से हिंदी तो कमजोर होगी ही भोजपुरी की डगर और भी कठिन हो जाएगी.

हिंदीसेवी श्याम रूद्र पाठक के मुताबिक : ‘‘भोजपुरी के अलग होने से हिंदी के समक्ष वही संकट पैदा होता है जो कश्मीर के संदर्भ में भारत के समक्ष है.’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर अमरनाथ ने बहुत असरदार तथ्यों और तर्कों के माध्यम से हिंदी और उसकी बोलियों विशेषतः भोजपुरी के संदर्भ में उपजी जटिल समस्या को स्पष्ट किया और हिंदी की वर्तमान स्थिति को यथावत बनाए रखने का आग्रह किया.

इस धरने में युवा बड़ी संख्या में मौजूद रहे. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र रोहित मिश्र ने इस मौके पर ओजस्वी कविता-पाठ भी किया. प्रो. अमरनाथ के नेतृत्व में आयोजित इस धरना-प्रदर्शन का समापन गृह मंत्री राजनाथ सिंह को ज्ञापन सौंप कर हुआ.

क्या है आठवीं अनुसूची

आठवीं अनुसूची में संविधान द्वारा मान्यताप्राप्त 22 प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख है. इस अनुसूची में आरंभ में 14 भाषाएं (असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू) थीं. बाद में सिंधी और उसके बाद कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली को भी इसमें शामिल किया गया. इससे इसकी संख्या 18 हो गई. फिर इसमें बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को भी शामिल किया गया. इस प्रकार इस अनुसूची में अब 22 भाषाएं हैं. मनोज तिवारी, संजय निरुपम, जीतन राम मांझी आदि अब इस अनुसूची में भोजपुरी, राजस्थानी, मगही को भी शामिल करने की मांग कर रहे हैं. मौजूदा विरोध इस बात को लेकर ही है.

इस विरोध के मुख्य सूत्रधार कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर, और हिंदी बचाओ मंच के संयोजक अमरनाथ हैं. वह इस तरह की मांग को हिंदी के अस्तित्व पर संकट की तरह देख रहे हैं. इससे बचाव के लिए उन्होंने देश-दुनिया के हिंदी-लेखकों का भारत के प्रधान मंत्री के नाम एक खुला पत्र भी साझा किया है. यह पत्र पढ़ कर इस पूरे मामले की गंभीरता और औचित्य को समझा जा सकता है. इस पत्र के आखिर में उन 113 लेखकों के नाम भी हैं जो इस मुहिम में उनके साथ हैं.  इस पत्र को अविकल हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :

सेवा में, 
श्री नरेंद्र मोदी जी
माननीय प्रधानमंत्री, 
भारत सरकार

विषय : भोजपुरी या हिंदी की किसी भी अन्य बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न किया जाए.

महोदय,

हमारी हिंदी आज टूटने के कगार पर है. निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोगों ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज कर दी है. भोजपुरी के कलाकार और दिल्ली से भाजपा के सांसद श्री मनोज तिवारी ने संसद और उसके बाहर भी यह मांग दुहराई है.

जन भोजपुरी मंच नामक संगठन ने अपनी मांग के पक्ष में जिन नौ आधारों का उल्लेख किया है उनमें से सभी आधार तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्ट, अतार्किक और भ्रामक हैं. हिंदी बचाओ मंच ने उनकी व्यापक छानबीन की है और उन सभी आधारों पर क्रमश: अपना पक्ष प्रस्तुत करता है.

1. भाषा विज्ञान की दृष्टि से भोजपुरी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रजी, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, कुमायूंनी-गढ़वाली, मगही, अंगिका आदि हिंदी की अन्य बोलियां. क्या उन सबको आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना संभव है?

2. भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है. हिंदी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिंदी भी. लिखने-पढ़ने का सारा काम हम लोग हिंदी में करते है? इसीलिए राजभाषा अधिनियम 1976 के अनुसार हमें ‘क’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बंटने के बावजूद हमें ‘हिंदी भाषी’ कहा गया है. वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की संख्या लगभग 3,30,99497 ही है.

3. स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ हम भोजपुरी भाषी ही नहीं थे. देश भर के लोगों ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था. वैसे स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले अब संयोग से बचे नहीं हैं. वर्ना, वे अपने उत्तराधिकारियों की मांग से कतई सहमत नहीं होते. उन्होंने तो अंग्रेजों की गुलामी से पूरे देश की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी जबकि ज.भो.मं. के लोग अपना घर बांटने के लिए लड़ रहे हैं.

4. ज.भो.मं. के अनुसार भोजपुरी देशी भाषा है तो क्या हिंदी देशी भाषा नहीं है? क्या वह किसी अन्य देश से आई है?

5. ज.भो.मं. ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय सहित देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भोजपुरी के पठन-पाठन का जिक्र किया है. यह सूचना भ्रामक है. भोजपुरी हिंदी का अभिन्न अंग है, वैसे ही जैसे राजस्थानी, अवधी, ब्रज आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी-पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिंदी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है. हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिंदी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

6. ज.भो.मं. ने मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने का तर्क दिया है. मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने से हिंदी भी गौरवान्वित हो रही है. इससे अपने देश में भोजपुरी को मान नहीं मिल रहा – यह कैसे प्रमाणित हो सकता है? क्या घर बांट लेना ही मान मिलना होता है? वैसे 2011 की जनगणना की रिपोर्ट अनुसार मारीशस की कुल आबादी 12,36,000 है जिसमें से सिर्फ 5.3 प्रतिशत लोग भोजपुरी भाषी है. यानी, किसी भी तरह यह संख्या एक लाख नहीं होगी.

7. क्या ज.भो.मं., मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएगा? तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक हम इन विषयों की पढ़ाई हिंदी में करा पाने में सफल नहीं हो सके. ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिंदी की रोटी खाते हैं और मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनके आस-पास की जनता गंवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.

8. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से करोड़ों भोजपुरी भाषियों में आत्मगौरव नहीं, आत्महीनताबोध पैदा होगा. घर बंटने से हिंदी भी कमजोर होगी और भोजपुरी भी.

9. ज.भो.मं. का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी को कोई क्षति नहीं होगी. हिंदी को होने वाली क्षति का बिंदुवार विवरण हम यहां दे रहे हैं :

संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से हिंदी को होने वाली क्षति

1. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदीभाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या (ज.भो.मं. के अनुसार 20 करोड़) घट जाएगी. मैथिली की संख्या हिंदी में से घट चुकी है. स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिंदी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिंदी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं हैं.

2. ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया की सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिंदी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिंदी का स्थान दूसरा रहता था. हिंदी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूंढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है. साम्राज्यवादियों द्वारा हिंदी की एकता को खंडित करने के षड़्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

3. हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है. अंग्रेजी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे-धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. उसके सामने हिंदी ही तनकर खड़ी हो सकती है, क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेजी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?

4. भोजपुरी की समृद्धि से हिंदी को और हिंदी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनों साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बांट लेना है. भोजपुरी तब हिंदी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिंदी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? क्योंकि तब कबीर हिंदी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए?

5. भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की?

6. कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बंटने से लोग कमजोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिंदी भी. इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिंदी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.

7. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को स्थान दिलाने की मांग आज भी लंबित है. यदि हिंदी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?

8. स्वतंत्रता के बाद हिंदी की व्याप्ति हिंदीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिंदी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिंदीभाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिंदीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिंदी का संख्या-बल घटा तो वहां की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहां हिंदी के पाठ्यक्रम जारी रखे जाएं या नहीं. इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केंद्रीय हिंदी संस्थान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय अथवा विश्व हिंदी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

मान्यवर, भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किंतु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

अत: ‘हिंदी बचाओ मंच’ के हम सभी सदस्य आपसे से विनम्र अनुरोध करते हैं कि कृपया हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न करें और इस विषय में यथास्थिति बनाए रखें.

सधन्यवाद,
निवेदक : भारत के हम हिंदी -लेखक :

1. डॉ. अमरनाथ, प्रोफेसर, क. वि. वि. तथा संयोजक, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
2. प्रो. अच्युतानंद मिश्र, पूर्व कुलपति, मा. च. पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल.
3. डॉ. अभिजीत सिंह, आलोचक एवं संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, सिलीगुड़ी.
4. प्रो. अनंतराम त्रिपाठी, प्रधानमंत्री, राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, वर्धा.
5. प्रो. अरुण होता, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, प.बं.रा.विश्वविद्यालय, बारासात.
6. प्रो. अच्युतन, पूर्व प्रोफेसर, हिंदी विभाग, कालीकट विश्वविद्यालय, कालीकट.
7. प्रो. आलोक पांडेय, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद.
8. प्रो. आलोक गुप्ता, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर.
9. डॉ. आशुतोष, लेखक व संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
10. ओमप्रकाश पांडेय, प्रतिष्ठित लेखक व संपादक, ‘नया परिदृश्य’, सिलीगुड़ी.
11. कविता वाचक्नवी, प्रख्यात लेखिका व महासचिव, ‘विश्वंभरा’, हॉस्टन, टैक्सास.
12. प्रो. कमलकिशोर गोयनका, प्रख्यात लेखक व उपाध्यक्ष, के.हि.सं., आगरा.
13. कनक तिवारी, प्रख्यात लेखक, सामाजसेवी व वरिष्ठ अधिवक्ता, हाई कोर्ट, बिलासपुर.
14. प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय.
15. डॉ. करुणा पांडेय, प्रतिष्ठित लेखिका, कोलकाता.
16. प्रो. काशीनाथ सिंह, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक, वाराणसी.
17. प्रो. कृष्णकुमार गोस्वामी, प्रख्यात भाषावैज्ञानिक व लेखक, दिल्ली.
18. डॉ. कैलाशचंद्र पंत, प्रतिष्ठित लेखक व मंत्री, म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल.
19. प्रो. गंगाप्रसाद विमल, प्रख्यात साहित्यकार व पूर्व प्रोफेसर, जे.एन.यू. नई दिल्ली.
20. चित्रा मुद्गल, व्यास सम्मान से सम्मानित कथाकार, दिल्ली.
21. प्रो. चौथीराम यादव, प्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसर, बी.एच.यू., वाराणसी.
22. ज्योतिष जोशी, प्रख्यात लेखक व संपादक, ललित कला अकादमी, दिल्ली.
23. प्रो. जवरीमल्ल पारख, प्रख्यात मीडिया समीक्षक व प्रोफेसर, इग्नू, नई दिल्ली.
24. डॉ. जवाहर कर्णावट, प्रतिष्ठित लेखक व सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा), मुंबई.
25. प्रो. जयप्रकाश, प्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसर, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय.
26. जय प्रकाश धूमकेतु, प्रतिष्ठित लेखक व संपादक ‘अभिनव कदम’, मऊनाथ भंजन.
27. जाबिर हुसेन, बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष व प्रख्यात लेखक, पटना.
28. प्रो. जी. गोपीनाथन, पूर्व कुलपति, म.गां.अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा.
29. जीवन सिंह, सह सचिव ‘अपनी भाषा’ एवं संस्थापक सदस्य ‘हिंदी बचाओ मंच’, कोलकाता.
30. प्रो. तंकमणि अम्मा, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, केरल विश्वविद्यालय, तिरुवनंतपुरम.
31. डॉ. दामोदर खड़से, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक, मुंबई.
32. प्रो. देवराज, प्रख्यात लेखक तथा डीन, म.गां.अं.हि.वि.विश्वविद्यालय, वर्धा.
33. डॉ. देवेंद्र गुप्त, प्रसिद्ध लेखक व संपादक, ‘सेतु’ एवं ‘विपाशा’, शिमला.
34. डॉ. देवसिंह पोखरिया, प्रख्यात आलोचक एवं प्रोफेसर, कुमायूं विश्वविद्यालय, नैनीताल.
35. प्रो. नंदकिशोर पांडेय, निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा.
36. डॉ. नरेश मिश्र, प्रोफेसर, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़.
37. डॉ. निर्मल कुमार पाटोदी, लेखक व पूर्व निदेशक राजभाषा, मुंबई.
38. नीरज कुमार चौधरी, शोधछात्र, क.वि.वि. एवं संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
39. पंकज बिष्ट, प्रख्यात लेखक व संपादक ‘समयांतर’, दिल्ली.
40. डॉ. परमानंद पांचाल, प्रसिद्ध लेखक व मंत्री, नागरी लिपि परिषद, दिल्ली.
41. पुष्पा भारती, प्रख्यात लेखिका, फ्लैट नं.-5, शाकुंतल साहित्य सहवास, मुंबई.
42. डॉ. प्रकाशचंद्र गिरि, प्रतिष्ठित कवि व एसो. प्रोफेसर, एम.एल.के.कॉलेज, बलरामपुर, उ.प्र.
43. प्रो. प्रमोद कुमार शर्मा, अधिष्ठाता, कला संकाय, नागपुर विश्वविद्यालय.
44. प्रेमपाल शर्मा, प्रख्यात भाषाविद्, लेखक तथा पूर्व संयुक्त सचिव, रेलवे बोर्ड, दिल्ली.
45. प्रभु जोशी, प्रख्यात लेखक व चित्रकार, इंदौर.
46. प्रो. पुष्पिता अवस्थी, सुप्रसिद्ध लेखिका व कवयित्री, नीदरलैंड.
47. बलदेव बंशी, प्रख्यात कवि-आलोचक, फरीदाबाद.
48. बीना बुदकी, मंत्री, हिंदी कश्मीरी संगम, दिल्ली.
49. डॉ. बीरेंद्र सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, स्काटिश चर्च कॉलेज व सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
50. बिजय कुमार जैन, प्रख्यात पत्रकार व संयोजक, हिंदी वेलफेयर ट्रस्ट, मुंबई.
51. प्रो. बी.वै.ललिताम्बा, प्रख्यात लेखिका, हिंदी सेवी व पूर्व प्रोफेसर, बंगलौर.
52. भारतेंदु मिश्र, प्रतिष्ठित लेखक व शिक्षाविद्, दिल्ली.
53. प्रो. महावीर सरन जैन, भाषाविद् व पूर्व निदेशक, के.हि.सं. आगरा.
54. डॉ. महेश दिवाकर, अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद.
55. महेश जायसवाल, प्रख्यात नाटककार व संस्कृतिकर्मी, कोलकाता.
56. महेश चंद्र गुप्त, प्रख्यात हिंदी सेवी व पूर्व निदेशक (राजभाषा), दिल्ली.
57. डॉ. एम. एल. गुप्ता आदित्य, संयोजक, वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई.
58. प्रो.एम. बेंकटेश्वर, समीक्षक व पूर्व प्रोफेसर, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद.
59. प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ.
60. प्रो. रंजना अरगड़े, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद.
61. रंजीत संकल्प, सचिव, बंगीय हिंदी परिषद एव संस्थापक सदस्य ‘हिंदी बचाओ मंच’, कोलकाता.
62. प्रो. रमेश दवे, प्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसर, भोपाल.
63. रमेश जोशी, प्रतिष्ठित लेखक व प्रधान संपादक ‘विश्वा’, ओहायो.
64. पद्मश्री रमेशचंद्र शाह, व्यास सम्मान से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार, भोपाल.
65. प्रो. रविभूषण, प्रख्यात लेखक व पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, रांची विश्वविद्यालय, रांची.
66. प्रो. रवि श्रीवास्तव, प्रख्यात आलोचक व पूर्व प्रोफेसर, हिंदी, राजस्थान वि.वि. जयपुर.
67. रविप्रताप सिंह, प्रतिष्ठित कवि व अध्यक्ष, ‘शब्दाक्षर’, कोलकाता.
68. डॉ. राजेंद्रनाथ त्रिपाठी, मंत्री, बंगीय हिंदी परिषद्, कोलकाता.
69. राजेंद्र प्रसाद पांडेय, प्रतिष्ठित लेखक, वाराणसी.
70. डॉ. राजेंद्र कुमार, प्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद.
71. प्रो. राजश्री शुक्ला, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता.
72. राजकिशोर, प्रख्यात लेखक-पत्रकार एवं संपादक, ‘रविवार’, इंदौर.
73. डॉ. राजेंद्र, आलोचक व संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
74. राकेश पांडेय, संपादक, ‘प्रवासी संसार’, नई दिल्ली.
75. राहुल देव, प्रख्यात पत्रकार, दिल्ली.
76. डॉ. राधेश्याम शुक्ल, संपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
77. प्रो. रूपा गुप्ता, प्रसिद्ध लेखिका व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, बर्दवान विश्वविद्यालय.
78. प्रो. रोहिणी अग्रवाल, लेखिका व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, म.द.विश्वविद्यालय, रोहतक.
79. डॉ. ऋषिकेश राय, प्रतिष्ठित कवि-आलोचक व उपनिदेशक (राजभाषा), टी.बोर्ड, कोलकाता.
80. प्रो.ऋषभदेव शर्मा, प्रतिष्ठित लेखक व संयुक्त संपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
81. विश्वनाथ सचदेव, प्रख्यात पत्रकार, संपादक ‘नवनीत’ मुंबई.
82. विभूतिनारायण राय, प्रख्यात लेखक व पूर्व कुलपति, म.गां.अं.हि.विश्वविद्यालय, वर्धा.
83. प्रो.विजयकुमार मल्होत्रा, प्रख्यात लेखक व भाषाविद्, दिल्ली.
84. डॉ. विजयबहादुर सिंह, प्रख्यात आलोचक एवं पूर्व संपादक ‘वागर्थ’, भोपाल.
85. विजय गुप्त, प्रसिद्ध लेखक व संपादक ‘साम्य’, अम्बिकापुर, जिला- सरगुजा, छ.ग.
86. डॉ. विमलेश कांति वर्मा, प्रख्यात भाषाविद्, व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय.
87. डॉ. विद्या बिंदु सिंह, प्रतिष्ठित लेखिका व पू.सं.नि. उ.प्र.हिं.सं. लखनऊ.
88. डॉ. वेदप्रताप वैदिक, प्रख्यात पत्रकार, दिल्ली.
89. डॉ. वेद प्रकाश पांडेय, प्रतिष्ठित लेखक व अवकाशप्राप्त प्राचार्य, गोरखपुर.
90. डॉ.शंकरलाल पुरोहित, प्रख्यात लेखक व अनुवादक, भुवनेश्वर.
91. शकुंतला बहादुर, प्रतिष्ठित लेखिका, कैलीफोर्निया.
92. शकुन त्रिवेदी, संपादक, ‘द वेक’, कोलकाता.
93. शची मिश्रा, भोजपुरी की प्रतिष्ठित लेखिका, पुणे.
94. प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन.
95. श्रीमती शांता बाई, सचिव, कर्णाटक महिला हिंदी सेवा समिति, बंगलौर.
96. श्रीधर बर्वे, प्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्राचार्य, इंदौर.
97. प्रो. श्रीभगवान सिंह, प्रख्यात लेखक व प्रोफेसर, भागलपुर विश्वविद्यालय.
98. डॉ. श्रीनिवास शर्मा, प्रख्यात आलोचक संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
99. प्रो. एस.एम. इकबाल, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हिंदी लेखक, विशाखापत्तनम्
100. प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय, प्रतिष्ठित लेखिका एवं कुलसचिव, कलकत्ता विश्वविद्यालय.
101. प्रो. संजीव कुमार दुबे, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर.
102. प्रो. एस. शेषारत्नम् पूर्व प्रोफेसर, आंध्रा विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम्.
103. प्रो.सुधीश पचौरी, प्रख्यात लेखक व पूर्व प्रतिकुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय.
104. प्रो. सदानंद गुप्त, प्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्रोफेसर, गोरखपुर विश्वविद्यालय.
105. डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी, संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
106. प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित, संयोजक हिंदी, साहित्य अकादेमी, दिल्ली.
107. प्रो. सुरेंद्र दुबे, प्रतिष्ठित लेखक व कुलपति, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी.
108. स्नेह ठाकुर, प्रतिष्ठित लेखिका व संपादक ‘वसुधा’, टोरंटो, कनाडा.
109. सुरेशचंद्र शुक्ल, प्रतिष्ठित लेखक व संपादक ‘Speil दर्पण’, नार्वे.
110. सुशील कुमार शर्मा, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, मिजोरम विश्वविद्यालय.
111. प्रो. हरिमोहन, कुलपति, जे. एस. विश्वविद्यालय, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद.
112. प्रो. हरिमोहन बुधौलिया, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, विक्रम वि.वि., उज्जैन.
113. क्षमा शर्मा, प्रतिष्ठित लेखिका, दिल्ली

सौजन्य से : http://https://www.thelallantop.com/bherant/apni-bhasha-and-hindi-bachao-manch-to-protest-in-jantar-mantar-tomorrow/

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बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध क्यों हो रहा है?


कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर और हिंदी बचाओ मंच के संयोजक डॉक्टर अमरनाथ बता रहे हैं कि भोजपुरी और राजस्थानी जैसी हिंदी की बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल क्यों नहीं किया जाना चाहिए.

विगत 14 जुलाई 2017 को ‘हिंदी बचाओ मंच’ की ओर से एक प्रतिनिधि मंडल माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार राजनाथ सिंह से उनके आवास पर मिला.

प्रतिनिधि मंडल में मेरे अलावा, प्रख्यात पत्रकार राहुल देव, पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि, प्रख्यात साहित्यकार चित्रा मुद्गल, मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, ‘प्रवासी संसार’ के संपादक राकेश पाण्डेय और दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. दर्शन पाण्डेय मौजूद थे.

हमने गृह मंत्री जी से कहा कि हमारी हिंदी आज टूटने के कगार पर है. भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज हो गई है.

कुछ सांसदों ने संसद में बार-बार यह मांग की दुहराई है. भोजपुरी के कलाकार और दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष सांसद मनोज तिवारी ने पिछले महीने दिल्ली में एनबीटी से एक खास बातचीत में बताया कि हिंदी की दो बोलियों- भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का फैसला ले लिया गया है.

ऐसी दशा में हमारी चिंता है कि यदि समय रहते हमने इस बिल के पीछे छिपी साम्राज्यवाद की साजिश और चंद स्वार्थी लोगों के कुचक्र का पर्दाफाश नहीं किया तो हमें डर है कि निकट भविष्य में यह बिल संसद में आ सकता है और यदि पास हो गया तो हमारी हिंदी टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगी और तब अंग्रेज़ी का एकछत्र वर्चस्व कायम हो जाएगा.

यह इस देश की अखंडता के खिलाफ तो होगा ही, व्यापक आम जनता के हित के भी प्रतिकूल होगा.

हमने इसी संदर्भ में माननीय गृह मंत्री जी से भेंट की, उन्हें वस्तुस्थिति बताने की कोशिश की और एक ज्ञापन भी दिया. मैं उस ज्ञापन को यहां यथावत प्रस्तुत कर रहा हूं-

सेवा में,

श्री राजनाथ सिंह जी

माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार.

विषय : भोजपुरी, राजस्थानी अथवा हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न किया जाए.

महोदय,

हमारी हिंदी टूटने के कगार पर है. निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोग भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. भोजपुरी के कलाकार और सांसद तथा दिल्ली के भाजपा के अध्यक्ष श्री मनोज तिवारी ने भी इस तरह का बयान दिया है कि हिंदी की दो बोलियों (भोजपुरी और राजस्थानी) को शीघ्र ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा.

इस मांग के पक्ष में जो तर्क दिए जा रहे हैं वे सभी तर्क तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्ट, मिथ्या और भ्रामक हैं. उदाहरणार्थ भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है.

हिंदी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिंदी भी. लिखने-पढ़ने का सारा काम हम लोग हिंदी में करते है?

ऐसी दशा में हमें सिर्फ भोजपुरी भाषी या अवधी भाषी कहना न्यायसंगत नहीं है. इसीलिए राजभाषा नियम 1976 के अनुसार हमें ‘क’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बंटने के बावजूद हमें ‘हिंदी भाषी’ कहा गया है.

वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की कुल संख्या लगभग 3,30,99497 ही है.

इतना ही नहीं, भोजपुरी हिंदी का अभिन्न अंग है, वैसे ही जैसे राजस्थानी, अवधी, ब्रज आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी- पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिंदी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है.

हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रजी, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिंदी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

क्या भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वाले मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून आदि की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएंगे? तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक हम इन विषयों की पढ़ाई हिंदी में करा पाने में सफल नहीं हो सके.

ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिंदी की रोटी खाते हैं और मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनके आसपास की जनता गंवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.

इस तरह की मांग करने वालों का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी को कोई क्षति नहीं होगी. हिंदी को होने वाली क्षति का बिन्दुवार विवरण हम यहां दे रहे हैं.

संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से हिंदी को होने वाली क्षति –

भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी भाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या घट जाएगी. मैथिली की संख्या हिंदी में से घट चुकी है.

स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिंदी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिंदी से छिनते देर नहीं लगेगी.

भोजपुरी के अलग होते ही ब्रजी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं हैं.

ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिंदी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिंदी का स्थान दूसरा रहता था.

हिंदी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूंढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है.

साम्राज्यवादियों द्वारा हिंदी की एकता को खंडित करने के षड्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेज़ी के वर्चस्व से है. अंग्रेज़ी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे-धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है.

उसके सामने हिंदी ही तनकर खड़ी हो सकती है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेज़ी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?

भोजपुरी की समृद्धि से हिंदी को और हिंदी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बांट लेना है. भोजपुरी तब हिंदी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बांग्ला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि.

आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिंदी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? क्योंकि तब कबीर हिंदी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए?

भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की ?

कमज़ोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बंटने से लोग कमज़ोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमज़ोर होगी और हिंदी भी.

इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिंदी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को स्थान दिलाने की मांग आज भी लंबित है. यदि हिंदी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?

स्वतंत्रता के बाद हिंदी की व्याप्ति हिंदीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिंदी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिंदी भाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिंदीतर भाषी राज्य भी हैं.

अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिंदी का संख्या-बल घटा तो वहां की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहां हिंदी के पाठ्यक्रम जारी रखे जाएं या नहीं.

इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केंद्रीय हिंदी संस्थान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय अथवा विश्व हिंदी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

भोजपुरी और राजस्थानी के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होते ही इन्हें स्वतंत्र विषय के रूप में यूपीएससी के पाठ्यक्रम में शामिल करना पड़ेगा. इससे यूपीएससी पर अतिरिक्त बोझ तो पड़ेगा ही, देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित इस सेवा का स्तर भी गिरेगा.

परीक्षा के लिए भोजपुरी, राजस्थानी आदि को विषय के रूप में चुनने वालों के पास सीमित पाठ्यक्रम होगा और उनकी उत्तर पुस्तिकाएं जांचने वाले भी गिने चुने स्थानीय परीक्षक होंगे.

अनुभव यही बताता है कि भाषा को मान्यता मिलने के बाद ही अलग राज्य की मांग होने लगती है. मैथिली को सन् 2003 में आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया और उसके बाद से ही मिथिलांचल की मांग की जा रही है.

महोदय, भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

 महोदय, अधोहस्ताक्षरित हम सभी तथा देश की व्यापक प्रबुद्ध जनता

हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के विरुद्ध है और इस विषय में वह यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में है.

हम इसके समर्थन में निम्नलिखित सामग्री आप के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं-

‘हिंदी बचाओ मंच’ से संबंधित तथा समाचार पत्रों में प्रकाशित सामग्री का उपलब्ध अंश (50 पृष्ठ)
2940 (दो हचार नौ सौ चालीस) प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा हस्ताक्षरित प्रपत्र की पहली किस्त.

गृह मंत्री जी से हमारी भेंट की खबर अखबारों में आई और हमने फेसबुक पर भी पोस्ट कर दिया. इसके बाद सिर्फ मेरे फेसबुक एकाउंट पर तीन दिन के भीतर लगभग आठ सौ प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं- कुछ विरोध में और ज्यादातर पक्ष में.

मेरे लिए उन सब प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करना संभव नहीं है किन्तु मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि विरोध वे लोग कर रहे हैं जिनका कुछ न कुछ निजी स्वार्थ है, जिन्हें लगता है कि भोजपुरी या राजस्थानी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से उन्हें कोई न कोई पुरस्कार मिलेगा या छोटी-मोटी दूसरी सुविधाएं.

इस बीच राजस्थानी और भोजपुरी से एमए की डिग्री हासिल करने वाले नौजवानों की एक बड़ी संख्या तैयार हो चुकी है जो नौकरियों की आस लगाए बैठी है, भले ही वह मृगमरीचिका ही साबित हो.

असल में जातीय चेतना जहां सजग और मजबूत नहीं होती वहां वह अपने समाज को विपथित भी करती हैं. समय-समय पर उसके भीतर विखंडनवादी शक्तियां सिर उठाती रहती हैं. विखंडन व्यापक साम्राज्यवादी षड्यंत्र का ही एक हिस्सा है. दुर्भाग्य से हिंदी जाति की जातीय चेतना मजबूत नहीं है और इसीलिए वह लगातार टूट रही है.

अस्मिताओं की राजनीति आज के युग का एक प्रमुख साम्राज्यवादी एजेंडा है. साम्राज्यवाद यही सिखाता है कि थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली. जब संविधान बना तो मात्र 13 भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल थीं. फिर 14, 18  और अब 22 हो चुकी हैं.

अकारण नहीं है कि जहां एक ओर दुनिया ग्लोबल हो रही है तो दूसरी ओर हमारी भाषाएं यानी अस्मिताएं टूट रही हैं और इसे अस्मिताओं के उभार के रूप में देखा जा रहा है.

हमारी दृष्टि में ही दोष है. इस दुनिया को कुछ दिन पहले जिस प्रायोजित विचारधारा के लोगों द्वारा गलोबल विलेज कहा गया था उसी विचारधारा के लोगों द्वारा हमारी भाषाओं और जातीयताओं को टुकड़ों-टुकड़ों में बांट करके कमज़ोर किया जा रहा है.

भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग समय-समय पर संसद में होती रही है. मामला सिर्फ भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने का नहीं है.

मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ ने 28 नवंबर 2007 को अपने राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी घोषित किया और विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की. यही स्थिति राजस्थानी की भी है.

हकीकत यह है कि जिस राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोरों से की जा रही है उस नाम की कोई भाषा वजूद में है ही नहीं.

राजस्थान की 74 में से सिर्फ 9 ( ब्रजी, हाड़ौती, बागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी) बोलियों को राजस्थानी नाम देकर संवैधानिक दर्जा देने की मांग की जा रही है. बाकी बोलियों पर चुप्पी क्यों?

इसी तरह छत्तीसगढ़ में 94  बोलियां हैं जिनमें सरगुजिया और हालवी जैसी समृद्ध बोलियां भी हैं. छत्तीसगढ़ी को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ने वालों को इन छोटी-छोटी उप-बोलियां बोलने वालों के अधिकारों की चिंता क्यों नहीं है?

पिछली सरकार के केंद्रीय गृहराज्य मंत्री नवीन जिंदल ने लोकसभा में एक चर्चा को दौरान कुमांयूनी-गढ़वाली को संवैधानिक दर्जा देने का आश्वासन दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यदि हरियाणा सरकार हरियाणवी के लिए कोई संस्तुति भेजती है तो उस पर भी विचार किया जाएगा.

मैथिली तो पहले ही शामिल हो चुकी है. फिर अवधी और ब्रजी ने कौन सा अपराध किया है कि उन्हें आठवीं अनुसूची में जगह न दी जाए जबकि उनके पास ‘रामचरितमानस’ और ‘पद्मावत’ जैसे ग्रंथ है?

हिंदी साहित्य के इतिहास का पूरा मध्य काल तो ब्रज भाषा में ही लिखा गया. इसी के भीतर वह कालखंड भी है जिसे हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग (भक्ति काल) कहते हैं.

भागलपुर विश्वविद्यालय में अंगिका में भी एमए की पढ़ाई होती है. मैने वहां के एक शिक्षक से पूछा कि अंगिका में एमए की पढ़ाई करने वालों का भविष्य क्या है? उन्होंने बताया कि उन्हें सिर्फ डिग्री से मतलब होता है विषय से नहीं.

एमए की डिग्री मिल जाने से एलटी ग्रेड के शिक्षक को पीजी (प्रवक्ता) का वेतनमान मिलने लगता है. वैसे नियमित कक्षाएं कम ही चलती हैं. जिन्हें डिग्री की लालसा होती है वे ही प्रवेश लेते हैं और अमूमन सिर्फ परीक्षा देने आते हैं.

जिस शिक्षक से मैंने प्रश्न किया उनका भी एक उपन्यास कोर्स में लगा है जिसे इसी उद्देश्य से उन्होंने अंगिका में लिखा है मगर हैं वे हिंदी के प्रोफेसर. वे रोटी तो हिंदी की खाते हैं किन्तु अंगिका को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसके पीछे उनका यही स्वार्थ है.

अंगिका के लोग अपने पड़ोसी मैथिली वालों पर आरोप लगाते हैं कि उन लोगों ने जिस साहित्य को अपना बताकर पेश किया है और संवैधानिक दर्जा हासिल किया है उसका बहुत सा हिस्सा वस्तुत: अंगिका का है.

इस तरह पड़ोस की मैथिली ने उनके साथ धोखा किया है. यानी, बोलियों के आपसी अंतर्विरोध. अस्मिताओं की वकालत करने वालों के पास इसका क्या जवाब है?

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हिंदुस्तान की कौन सी भाषा है जिसमें बोलियां नहीं हैं? गुजराती में सौराष्ट्री, गामड़िया, खाकी, आदि, असमिया में क्षखा, मयांग आदि, ओड़िया में संभलपुरी, मुघलबंक्षी आदि, बंगला में बारिक, भटियारी, चिरमार, मलपहाड़िया, सामरिया, सराकी, सिरिपुरिया आदि, मराठी में गवड़ी, कसारगोड़, कोस्ती, नागपुरी, कुड़ाली आदि.

इनमें तो कहीं भी अलग होने का आंदोलन सुनाई नहीं दे रहा है. बांग्ला तक में नहीं, जहां अलग देश है. मैं बांग्ला में लिखना-पढ़ना जानता हूं किन्तु ढाका की बंगला समझने में बड़ी असुविधा होती है.

फिर भी बंगलादेश और पश्चिम बंगाल दोनों की बांग्ला एक ही है. रवीन्द्रनाथ और नजरुल इस्लाम जैसे वहां पढ़े-पढ़ाए जाते हैं वैसे ही हमारे देश में भी.

अस्मिताओं की राजनीति करने वाले कौन लोग हैं ? कुछ गिने-चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार. नेता जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए.

उन्हें पता होता है कि किस तरह अपनी भाषा और संस्कृति की भावनाओं में बहाकर गांव की सीधी-सादी जनता का मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है.

इसी तरह भोजपुरी का अभिनेता रवि किशन यदि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संसद के सामने धरना देने की धमकी देता है तो उसका निहितार्थ समझ में आता है क्योकि, एक बार मान्यता मिल जाने के बाद उन जैसे कलाकारों और उनकी फिल्मों को सरकारी खजाने से भरपूर धन मिलने लगेगा.

शत्रुघ्न सिन्हा ने लोकसभा में यह मांग उठाते हुए दलील दी थी कि इससे भोजपुरी फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और वैधानिक दर्जा दिलाने में काफी मदद मिलेगी.

विगत 3 मार्च 2017 को बिहार की कैबिनेट ने सर्वसम्मति से इस आशय का प्रस्ताव पारित करके भारत के गृह मंत्री को भेजा है कि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए.

उस पत्र में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि इससे राजभाषा हिंदी पर क्या प्रभाव पड़ेगा. आश्चर्य तो यह देखकर हुआ कि बिहार के मुख्य सचिव द्वारा हस्ताक्षरित उस पत्र में आल्हा सहित तुलसी और नागार्जुन जैसे कवियों को भोजपुरी के खाते में डाल दिया गया है.

बोलियों को संवैधानिक मान्यता दिलाने में वे साहित्यकार सबसे आगे हैं जिन्हें हिंदी जैसी समृद्ध भाषा में पुरस्कृत और सम्मानित होने की उम्मीद टूट चुकी है. हमारे कुछ मित्र तो इन्हीं के बल पर हर साल दुनिया की सैर करते हैं और करोड़ों का वारा-न्यारा करते हैं.

स्मरणीय है कि नागार्जुन को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी मैथिली कृति पर मिला था किसी हिंदी कृति पर नहीं. बुनियादी सवाल यह है कि आम जनता को इससे क्या लाभ होगा?

मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हुए 14 साल हो गए. कितनी नौकरियां सृजित हुईं? मैथिली माध्यम वाले कितने प्राथमिक विद्यालय खुले और उनमें कितने बच्चों का पंजीकरण हुआ? हां, कुछ लोग पुरस्कृत जरूर हो गए.

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गृहमंत्री से मुलाकात करने वाले हिंदी के साहित्यकार. (फोटो क्रेडिट: अमरनाथ/फेसबुक)

एक ओर तो उत्तरांचल जैसे हिंदी भाषी राज्यों में सभी सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेज़ी माध्यम लागू करना और इस तरह देश के ऊपर के उच्च-मध्य वर्ग को अंग्रेज बनाने की योजना और दूसरी ओर गरीब-गंवार जनता को उसी तरह कूप मंडूक बनाए रखने की साजिश. इस साजिश में कॉरपोरेट दुनिया की क्या और कितनी भूमिका है–यह शोध का विषय है. मुझे उम्मीद है कि निष्कर्ष चौंकाने वाले होंगे.

वस्तुत: साम्राज्यवाद की साजिश हिंदी की शक्ति को खण्ड-खण्ड करने की है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी, दुनिया की सबसे बड़ी दूसरे नंबर की भाषा है. इस देश में अंग्रेज़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिंदी ही है.

इसलिए हिंदी को कमज़ोर करके इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता को, इस देश की रीढ़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है. अस्मिताओं की राजनीति के पीछे साम्राज्यवाद की यही साजिश है.

जो लोग बोलियों की वकालत करते हुए अस्मिताओं के उभार को जायज ठहरा रहे हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, खुद व्यवस्था से सांठ-गांठ करके उसकी मलाई खा रहे हैं और अपने आसपास की जनता को जाहिल और गंवार बनाए रखना चाहते हैं ताकि भविष्य में भी उन पर अपना वर्चस्व कायम रहे.

जिस देश में खुद राजभाषा हिंदी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो वहां भोजपुरी, राजस्थानी, और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देकर वे उन्हें क्या बनाना चाहते हैं?

जिस भोजपुरी, राजस्थानी या छत्तीसगढ़ी का कोई मानक रूप तक तय नहीं है, जिसके पास गद्य तक विकसित नहीं हो सका है उस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराकर उसमें मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की उम्मीद करने के पीछे की धूर्त मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है.

अगर बोलियों और उसके साहित्य को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उसके साहित्य को पाठ्यक्रमों में शामिल कीजिए, उनमें फिल्में बनाइए, उनका मानकीकरण कीजिए.

उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिंदी से अलग कर देना और उसके समानान्तर खड़ा कर देना तो उसे और हिंदी, दोनों को कमज़ोर बनाना है और उन्हें आपस में लड़ाना है.

मैं बंगाल में रहता हूं. बंगाल की दुर्गा पूजा मशहूर है. मैं जब भी हिंदी के बारे में सोचता हूं तो मुझे दुर्गा का मिथक याद आता है. दुर्गा बनी कैसे? महिषासुर से त्रस्त सभी देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए थे.

सौजन्य से : http://thewirehindi.com/13725/arguments-against-the-inclusion-of-dialects-in-the-eighth-schedule-of-the-constitution/

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अपनी भाषा

“राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है ।
नदी,पहाड़ और समुद्र राष्ट्र नहीं बनाते । भाषा ही वह बंधंन है जो चिर काल तक राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रहता है और उसका शीराजा ( संरचना ) बिखरने नहीं देता ।” 
– प्रेमचंद

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