उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा के प्रस्ताव के विरोध में उप मुख्य मंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को ज्ञापन- डॉ. अमरनाथ

उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा के प्रस्ताव के विरोध में उप मुख्य मंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को ज्ञापन-
आज उत्तर प्रदेश के उप मुख्य मंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को एक ज्ञापन दिया और उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने संबंधी सरकार के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया.
वास्तव में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के पांच हजार सरकारी प्राथमिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम में बदलने का निर्णय लिया है. हमने उप मुख्य मंत्री महोदय से मिलकर सरकार के इस फैसले से होने वाले भयंकर दुष्परिणामों की ओर ध्यान आकृष्ट किया और कहा कि इससे बाकी विद्यालयों के विद्यार्थियों में बचपन से ही हीनता का भाव पैदा होगा. इतना ही नहीं, इसका प्रभाव सारे देश पर पड़ेगा और दूसरे प्रदेशों की सरकारें भी इसका अनुकरण करेंगी.


हमने उन्हें स्मरण दिलाया कि अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, रूस, चीन, जापान आदि दुनिया के सभी विकसित देशों में संपूर्ण शिक्षा अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी, चीनी, जापानी आदि उनकी अपनी मातृभाषाओं में ही दी जाती है. इसीलिए वहां मौलिक चिन्तन संभव हो पाता है. विदेशी माध्यम वाली शिक्षा सिर्फ नकलची पैदा करती है. जब अंग्रेज नही आए थे और हम अपनी भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करते थे तो हमने दुनिया को बुद्ध और महावीर दिए, वेद और उपनिषद् दिए, दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र दिए, चरक जैसा शरीर विज्ञानी और शूश्रुत जैसा शल्य चिकित्सक दिए, पाणिनि जैसा वैयाकरण और आर्य भट्ट जैसा खगोलविज्ञानी दिए, पतंजलि जैसा योगाचार्य और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिए. हमारे देश में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे जहाँ दुनिया भर के विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे और इस देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था.
वास्तव में व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु सोचता वह अपनी भाषा में है. हमारे बच्चे दूसरे की भाषा में पढ़ते हैं फिर उसे अपनी भाषा में ट्रांसलेट करके सोचते हैं और फिर उन्हें लिखने के लिए भी दूसरे की भाषा में ट्रांसलेट करना पड़ता है. इस तरह हमारे बच्चों के जीवन का बड़ा हिस्सा दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है.
हमने उन्हें यह भी स्मरण दिलाया कि सरकार जिन देशों की अंग्रेजी हमारे बच्चों पर लाद रही है उन्हीं अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में पढ़ाई के उद्देश्य से जाने वाले हर विद्यार्थी को आइइएलटीएस ( इंटरनेशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम ) अथवा टॉफेल ( टेस्ट ऑफ इंग्लिश एज फॉरेन लैंग्वेज) जैसी परीक्षाएं पास करनी अनिवार्य हैं. दूसरी ओर हमारे देश के अधिकांश अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में बच्चों को अपने देश की राजभाषा हिन्दी या उनकी मातृभाषा बोलने पर दंडित किया जाता है और सरकारें कुछ नहीं बोलती. अपनी भाषाओं का इतना अपमान भारत में ही संभव है. यह गुलामी नहीं तो क्या है ?
ज्ञापन में कहा गया है कि अभिभावकों द्वारा अंग्रेजी की मांग का मुख्य कारण नौकरियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता है. चपरासी से लेकर यू.पी.एस.सी. तक की सभी नौकरियों में अंग्रेजी का दबदबा है. लगभग सभी उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में सिर्फ अंग्रेजी में कार्यवाहियाँ होती है. ऐसी दशा में अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम का विकल्प चुनने के लिए बाध्य हैं. इसलिए इससे निजात पाने का एक मात्र रास्ता यही है कि नौकरियों में से अंग्रेजी का वर्चस्व कम किया जाय, न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ साथ उस प्रदेश की राजभाषाओं में भी न्यायिक कार्यवाहियां संपन्न हों. सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में समुचित संशाधन उपलब्ध काराएं जाएं. पर्याप्त और सुयोग्य शिक्षक नियुक्त किए जाएं. यदि ऐसा होगा तो स्वत: ही मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा की मांग होने लगेगी.


उप मुख्यमंत्री महोदय ने हमारी बातें ध्यान से सुनीं और समुचित कार्यवाही का आश्वासन भी दिया.
प्रिय भाई प्रो. पवन अग्रवाल के प्रयास से ही उप मुख्य मंत्री महोदय से यह भेंट संभव हो सकी. मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूँ.

प्रेस क्लब, लखनऊ के सभागार में अमरनाथ जी का व्याख्यान,विषय” हिन्दी का संयुक्त परिवार : विघटन के संकट “

प्रेस क्लब, लखनऊ के सभागार में कल व्याख्यान दिया । विषय था, ” हिन्दी का संयुक्त परिवार : विघटन के संकट ” । व्याख्यान को लोगों ने सराहा ।अखबारों ने खबरें प्रकाशित कीं । ‘दैनिक जागरण’ और ‘अमर उजाला’ मेरे सामने है । ये लखनऊ के सर्वाधिक लोकप्रिय अखबार हैं ।
‘अवध भारती संस्थान’ के संयोजक और ‘अवध ज्योति’ के संपादक डाॅ राम बहादुर मिश्र ने यह आयोजन किया था । मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं ।

– डॉ. अमरनाथ

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र – “आदरणीय मोदी जी ! आप की सरकार ने तो मैकाले को भी पीछे छोड़ दिया”- • डॉ. अमरनाथ

(प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र)

आदरणीय मोदी जी ! आप की सरकार ने तो मैकाले को भी पीछे छोड़ दिया.
• डॉ. अमरनाथ

आदरणीय मोदी जी! आप जिस तरह झूम झूम कर मंत्रमुग्ध कर देने वाला भाषण हिन्दी में देते हैं क्या उसी तरह का प्रभावशाली भाषण अंग्रेजी में भी दे सकते हैं ? आप जिस तरह अपने को हिन्दी में अभिव्यक्त कर लेते हैं क्या उसी तरह अंग्रेजी में भी कर सकते हैं ? नहीं न ? विश्वास कीजिए हम सबके साथ ऐसा ही होता है.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के गत 30 अक्टूबर 2017 के अंक में छपी खबर के अनुसार आप की सरकार ने दिल्ली कारपोरेशन के अंतर्गत आने वाले सभी 1700 से अधिक स्कूलों को आगामी मार्च से अंग्रेजी माध्यम में बदल देने का फैसला लिया है. इसी तरह का फैसला गत जून के अंतिम हफ्ते में उत्तराखंड की सरकार ने अपने यहां के 18000 से भी अधिक स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम बनाने की घोषणा करके लिया था.
महोदय, आप की सरकार का यह निर्णय हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ तो है ही, यह निर्णय इस देश के अस्सी प्रतिशत प्रतिभाशाली बच्चों के मौलिक अधिकारों का भी हनन है और उन्हें देश की मुख्य धारा में शामिल होने से रोकना है.
मान्यवर, आप जब प्रधान मंत्री बने थे तो हम बहुत खुश थे. हमें लगा कि हमारे बीच का एक व्यक्ति जिसने गरीबी देखी है, संघर्ष झेला है वह हमारा नेतृत्व करेगा और हमारे हित में जरूर फैसले लेगा. किन्तु, आप की सरकार ने तो मैकाले को भी पीछे छोड़ दिया. मैकाले भी इस देश में बुनियादी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से देने की हिम्मत नहीं जुटा सका था. आप भली भांति जानते हैं कि इस देश के मुट्ठीभर लोगों ने सत्ता पर कब्जा जमाए रखने के लिए अंग्रेजी को एक हथियार की तरह अपनाया हुआ है. जबतक हमारी शिक्षा हमारी अपनी भाषाओं के माध्यम से नहीं होंगी तबतक गांवों की दबी हुई प्रतिभाओं को मुख्य धारा में आने का अवसर नहीं मिलेगा. आजादी के बाद इस विषय को लेकर राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग आदि अनेक आयोग बने और उनके सुझाव भी आए. सबने एक स्वर से यही संस्तुति की कि बच्चों की बुनियादी शिक्षा सिर्फ मातृभाषाओं में ही दी जानी चाहिए. दुनिया के सभी विकसित देशों में वहां की मातृभाषाओं में ही शिक्षा दी जाती है. मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि अपनी मातृभाषा में बच्चे खेल खेल में ही सीखते हैं और बड़ी तेजी से सीखते हैं. उनकी कल्पनाशीलता का खुलकर विकास मातृभाषाओं में ही हो सकता है. गाँधी जी चाहते थे कि बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सब कुछ मातृभाषा के माध्यम से हो. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा है, “ अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही हमारे लड़के और लड़कियों की विदेशी माध्यम के जरिये शिक्षा बंद कर दूं और सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से यह माध्यम तुरन्त बदलवा दूं या उन्हें बरखास्त कर दूं. मैं पाठ्यपुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूंगा. वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आवेंगी.” ‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने लिखा कि, “. अंग्रेजी शिक्षण से दंभ द्वेष अत्याचार आदि बढ़े हैं. अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी. भारत को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं.”
आप स्वयं जिस ‘विश्वभारती’, शान्तिनिकेतन के चांसलर हैं उसके संस्थापक गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा के माध्यम विषय पर कहा हैं,” हमारा मन तेरह –चौदह वर्ष की आयु से ही ज्ञान का प्रकाश तथा भाव का रस प्राप्त करने के लिए खुलने लगता है. उसी समय यदि उसके ऊपर किसी पराई भाषा के व्याकरण तथा शब्दकोश रटने के रूप में पत्थरों की वर्षा आरंभ कर दी जाय तो बतलाइए कि वह सुदृढ़ और शक्तिशाली किस प्रकार हो सकता है ? ” उल्लेखनीय है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा इंग्लैंड में अंग्रेजी माध्यम से हुई थी और उनके जीवन के प्रारंभिक आठ वर्ष यूरोप में ही व्यतीत हुए थे. आप को पता ही होगा, ‘विश्वभारती’ की माध्यम-भाषा उन्होंने बांग्ला को ही चुना.
महोदय, आप ने पिछले दिनों एक लाख करोड़ की लागत वाली जापान की तकनीक और कर्ज के बलपर जिस बुलेट ट्रेन की नींव रखी है उस जापान की कुल आबादी सिर्फ 12 करोड़ है. वह छोटे छोटे द्वीपों का समूह है. वहां का तीन चौथाई से अधिक भाग पहाड़ है और सिर्फ 13 प्रतिशत हिस्से में ही खेती हो सकती है. फिर भी वहां सिर्फ भौतिकी में 13 नोबेल पुरस्कार पाने वाले वैज्ञानिक हैं. ऐसा इसलिए है कि वहां 99 प्रतिशत जनता अपनी भाषा ‘जापानी’ में ही शिक्षा ग्रहण करती है. इसी तरह कुछ दिन पहले आप ने जिस इजराइल की यात्रा की थी और उसके विकास पर लट्टू थे उस इजराइल की कुल आबादी मात्र 83 sलाख है और वहां 11 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हैं क्योंकि वहां भी उनकी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ में शिक्षा दी जाती है. चीन के राष्ट्रपति का स्वागत भी आप कर चुके हैं. चीन उसी तरह का बहुभाषी विशाल देश है जिस तरह का भारत. किन्तु उसने भी अपनी एक भाषा चीनी ( मंदारिन) को प्रतिष्ठित किया और उसे वहां पढ़ाई का माध्यम बनाया. चीनी बहुत कठिन भाषा है. चीनी लिपि दुनिया की संभवत: सबसे कठिन लिपियों में से एक है. वह चित्र-लिपि से विकसित हुई है. आज चीन जिस ऊंचाई पर पहुंचा है उसका सबसे प्रमुख कारण यही है कि उसने अपने देश में शिक्षा का माध्यम अपनी चीनी भाषा को बनाया. इसी तरह अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, रूस आदि दुनिया के सभी विकसित देशों में वहां की अपनी भाषाओं क्रमश: अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी आदि में ही शिक्षा दी जाती है. इसीलिए वहां मौलिक चिन्तन संभव हो पाता है. मौलिक चिन्तन सिर्फ अपनी भाषा में ही हो सकता है. व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु सोचता अपनी भाषा में ही है. हमारे बच्चे दूसरे की भाषा में पढ़ते हैं फिर उसे अपनी भाषा में ट्रांसलेट करके सोचते हैं और लिखने के लिए फिर उन्हें दूसरे की भाषा में ट्रांसलेट करना पड़ता है. इस तरह हमारे बच्चों के जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है. अंग्रेजी माध्यम अपनाने के बाद से हम सिर्फ नकलची पैदा कर रहे हैं. अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा सिर्फ नकलची ही पैदा कर सकती है.
आप तो अपनी विरासत समझते हैं! याद कीजिए, जब अंग्रेज नहीं आए थे और हम अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण करते थे तब हमने दुनिया को बुद्ध और महावीर दिए, वेद और उपनिषद दिए, दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र दिए, चरक जैसे शरीर विज्ञानी और शूश्रुत जैसे शल्य-चिकित्सक दिए, पाणिनि जैसा वैयाकरण और आर्य भट्ट जैसे खगोलविज्ञानी दिए, पतंजलि जैसा योगाचार्य और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिए. हमारे देश में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे जहां दुनिया भर के विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे. इस देश को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था जिसके आकर्षण में ही दुनिया भर के लुटेरे यहां आते रहे. प्रख्यात आलोचक रामविलास शर्मा ने कहा है कि दुनिया के किसी भी देश की संस्कृति से मुकाबला करने के लिए अपने यहां के सिर्फ तीन नाम ले लेना ही काफी है- तानसेन, तुलसीदास और ताजमहल.
मोदी जी, इस समय हमारे देश में 8 करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते. सबसे पहले उन्हें स्कूल भेजने की व्यवस्था कीजिए, प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती कीजिए, सरकारी विद्यालयों को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराइए. शिक्षा का क्षेत्र आज भारी मुनाफे का क्षेत्र हो गया है. सबसे ज्यादा निवेश यहीं हो रहे हैं. प्राइवेट स्कूलों में शिक्षक बंधुआ मजदूर की तरह काम करता है. वह मालिकों की चापलूसी में लगा रहता है, शिक्षा क्या देगा ? इसपर अंकुश लगाइए और शिक्षा को पूरी तरह न हो सके तो अधिक से अधिक सरकारी नियंत्रण में ले आइए. यहीं भावी नागरिक तैय़ार होते हैं. इससे पल्ला झाड़ना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है.
मोदी जी, अंग्रेजी ही ज्ञान की भाषा है- यह बहुत बड़ा झूठ है. यह गलत अफवाह फैलाया जाता है कि उच्च शिक्षा (ज्ञान-विज्ञान-तकनीक) की पढ़ाई हिंदी में नहीं हो सकती. जब चीन की मंदारिन (चीनी) जैसी कठिन भाषा में ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीक की पढ़ाई हो सकती है तो हिंदी में क्यों नहीं हो सकती? हिंदी विश्व की सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर है. इसके पास देवनागरी जैसी वैज्ञानिक लिपि है जिसमें जो बोला जाता है वही लिखा जाता है. यह अत्यंत सहज और सरल भाषा है, किन्तु इसको माध्यम के रूप में न अपनाने के कारण देश की प्रतिभाओं का गला घोंटा जाता है.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की उक्त रपट में अंग्रेजी माध्यम लागू करने के कारणों के बारे में भी विस्तार से बताया गया है और कहा गया है कि यह निर्णय अभिभावकों की मांग पर लिया गया है. अभिभावक अपने बच्चों को कारपोरेशन के स्कूलों की जगह अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूलों मे प्रवेश दिलाना पसंद कर रहे हैं. इस तरह कारपोरेशन के स्कूलों में छात्र-संख्या घट रही है. इस तरह तो देश भर के सभी सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम में बदलना पड़ेगा. क्या आप की यही योजना है ?
महोदय, जब आप चपरासी तक की नौकरियों में भी अंग्रेजी अनिवार्य करेंगे तो अंग्रेजी की मांग बढ़ेगी ही. यह एक ऐसा मुल्क बन चुका है जहां का नागरिक चाहे देश की सभी भाषाओं में निष्णात हो किन्तु एक विदेशी भाषा अंग्रेजी न जानता हो तो उसे इस देश में कोई नौकरी नहीं मिल सकती और चाहे वह इस देश की कोई भी भाषा न जानता हो और सिर्फ एक विदेशी भाषा अंग्रेजी जानता हो तो उसे इस देश की छोटी से लेकर बड़ी तक सभी नौकरियाँ मिल जाएंगी. छोटे से छोटे पदों से लेकर यू.पी.एस.सी. तक की सभी भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी का दबदबा है. उच्चतम न्यायालय से लेकर सभी उच्च न्यायालयों में सारी बहसें और फैसले सिर्फ अंग्रेजी में होने का प्रावधान है. यह ऐसा तथाकथित आजाद मुल्क है जहां के नागरिक को अपने बारे में मिले फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है और उसके लिए भी वकील को पैसे देना पड़ता है. मुकदमों के दौरान उसे पता ही नही होता कि वकील और जज उसके बारे में क्या सवाल-जबाब कर रहे हैं. ऐसे माहौल में कोई अपने बच्चे को अंग्रेजी न पढ़ाने की मूर्खता कैसे कर सकता है ?
आप जिस अमेरिका और इंग्लैंड की अंग्रेजी हमारे बच्चों पर लाद रहे हैं उसी अमेरिका और इंग्लैण्ड में पढ़ाई के लिए जाने वाले हर सख्स को आइइएलटीएस ( इंटरनेशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम ) अथवा टॉफेल ( टेस्ट आफ इंग्लिश एज फॉरेन लैंग्वेज) जैसी परीक्षाएं पास करनी अनिवार्य हैं. दूसरी ओर, हमारे देश के अधिकाँश अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में बच्चों को अपने देश की राजभाषा हिन्दी या मातृभाषा बोलने पर दंडित किया जाता है और आप की सरकार कुछ नहीं बोलती. यह गुलामी नहीं तो क्या है? बेशक गोरों की नहीं, काले अंग्रेजों की गुलामी. गुलाम व्यक्ति ही सोचता है कि मालिक भाषा बोलेंगे तो फायदे में रहेंगे.
महोदय, आप तो चुनौती-भरा और कठोर निर्णय लेने के लिए विख्यात हैं. अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाइए सरकारी नौकरियों से, न्यायपालिका और कार्यपालिका से और देखिए, रातो रात अंग्रेजी की जगह मातृभाषाओं के माध्यम से पढ़ने वालों की मांग बढ़ जाएगी. फिर आप को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक समूची शिक्षा व्यवस्था मातृभाषाओं के माध्यम से लागू करना पड़ेगा और आप देखेंगे कि इस देश की प्रतिभाएं फिर से दुनिया में अपनी कीर्ति- पताका फहराएंगी. इतिहास में आप का भी नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा.

       

30 और 31 अगस्त को छत्तीसगढ़ में शिक्षकों एवं छात्रों को समक्ष व्याख्यान देते हुए प्रो. अमरनाथ

30 और 31 अगस्त को छत्तीसगढ़ में रहा । 30 को साहित्य एवं भाषा अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों को तथा 31 को गर्ल्स काॅलेज, दुर्ग और शासकीय महाविद्यालय गुण्डरदेही, जिला बालोद के विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित किया । हिन्दी का संयुक्त परिवार, उसका महत्व और इस संयुक्त परिवार को विखंडित करने का कुचक्र रचने वाले कुछ स्वार्थी तत्वों के कारनामे ही मेरे व्याख्यान के विषय रहे । सभी आयोजन अत्यंत सफल रहे ।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में साहित्य एवं भाषा अध्ययन शाला के अंतर्गत ही हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत आदि सभी भाषाओं और उनके साहित्य का अध्ययन होता है । इसके अध्यक्ष प्रो. केसरीलाल वर्मा हैं । प्रो. वर्मा केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के निदेशक भी रह चुके हैं । यहां छत्तीसगढ़ी में भी एम. ए. की पढ़ाई होती है । मैंने प्रो. वर्मा से पूछा कि छत्तीसगढ़ी से एम. ए. करने वालों को नौकरी कौन सी मिलती है तो उन्होंने बताया कि उन्हें छत्तीसगढ़ी की डिग्री के आधार पर कोई नौकरी नहीं मिलती है। फिर भी यहां के छत्तीसगढ़ी विभाग में 75 छात्रों ने प्रवेश लिया है । इन्हें उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ी आठवीं अनुसूची में शामिल होगी तो इन्हें जरूर नौकरी मिलेगी ।
बहरहाल, मैंने सभी जगह व्याख्यान दिया, परचे बांटे और सबसे हस्ताक्षर भी कराए । आयोजनों को सफल बनाने में प्रो.केसरीलाल वर्मा, डाॅ. अभिषेक पटेल और डाॅ. अंबरीश त्रिपाठी की विशेष भूमिका रही । मैं इन सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूं ।

–     डॉ. अमरनाथ

संयोजक हिंदी बचाओ मंच

‘भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण’ और भोजपुरी की राजनीति -डॉ. अमरनाथ

  • विगत 13 अगस्त को राष्ट्रीय सहारा ( दिल्ली) में छपा लेख मित्रों के अवलोकनार्थ-
    ‘भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण’ और भोजपुरी की राजनीति
    प्रो. गणेश एन. देवी ने एन.डी.टी.वी. के एक कार्यक्रम में रवीश कुमार के साथ बातचीत करते हुए जबसे कहा है कि “ भोजपुरी, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई भाषा है.“ तब से भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वालों के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं. सोशल मीडिया पर प्रो. देवी का उक्त उद्धरण बार बार उछाला जा रहा है. जबकि प्रो. गणेश एन. देवी ने आठवीं अनुसूची का जिक्र तक नहीं किया. भोजपुरी के संबंध में उनकी उक्त अवधारणा का आधार क्या है ? क्यों अंग्रेजी सबसे तेजी से बढ़ती हुई भाषा नहीं है जबकि भारत जैसे देश में यह विदेशी भाषा प्राथमिक कक्षाओं से ही अनिवार्य हो चुकी है ? इस अंग्रेजी के बगैर इस देश में आज कोई नौकरी नहीं मिल सकती. इस बारे में गणेश एन. देवी मौन हैं. मुझे लगता है कि एक भोजपुरी भाषी रवीश कुमार से संवाद करते हुए सहज ही उनकी जबान से यह वाक्य निकल गया, वर्ना दुनिया में बहुत सी भाषाएं हैं जो भोजपुरी की तुलना में अधिक तेजी से विकास कर रही हैं. खुद खड़ी बोली हिन्दी जिस रफ्तार से विकसित और प्रतिष्ठित हुई है, वह एक मिशाल है. जबकि भोजपुरी और खड़ी बोली हिन्दी की उम्र लगभग समान ही है.
    बहरहाल, गणेश एन. देवी के नेतृत्व में किया गया भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण ( पीपल्स लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया ) आजाद भारत की एक बड़ी उपलब्धि है. इसके पहले ब्रिटिश काल में एक अंग्रेज आई.सी.एस. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण किया था. 30 वर्ष तक लगातार सर्वेक्षण करने के बाद सन् 1928 में उनका कार्य ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ नाम से 11 खण्डों में प्रकाशित हुआ था. भाषा के अध्येताओं के लिए स्रोत के रूप में आज तक ग्रियर्सन का ही शोध-कार्य उपलब्ध था. आज फिर से प्रो. गणेश एन. देवी ने प्रमाणित कर दिया कि शोध के क्षेत्र में सांस्थानिक प्रयासों की तुलना में वैयक्तिक प्रयास कहीं अधिक सफल और प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं. 90 खंडों में प्रकाशित होने वाले अपने सर्वेक्षण में गणेश एन. देवी और उनकी टीम ने 780 भाषाओं का सर्वेक्षण किया है और उनके इस कार्य में 10 वर्ष का समय लगा है.
    रवीश कुमार ने विगत 3 अगस्त को अपने कार्यक्रम का आरंभ करते हुए कहा, “ जब भी हम सुनते हैं कि भाषाएं मर रही हैं तो आम समाज में इन खबरों को लेकर किसी को अफसोस करते हुए नहीं देखा गया. लोगों को लड़ते हुए जरूर देखा कि हमारी भाषा आठवीं अनुसूची मे नहीं आई और उनकी भाषा क्यों आ गई.”
    रवीश कुमार से बातचीत करने के दौरान भी और अपने सर्वेक्षण में भी गणेश एन. देवी की मुख्य चिन्ता यह है कि “भारत भाषाओं का कब्रिस्तान बनता जा रहा है.” पिछले 50 वर्षों में भारत की 250 भाषाएं मर चुकी हैं और अगले 50 वर्षों में भारत की लगभग 400 भाषाओं के विलुप्त हो जाने का खतरा है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक भाषा के मर जाने का मतलब होता है एक पूरी जाति का मर जाना.
    भोजपुरी को संविधान का आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वालों को गणेश एन. देवी की मुख्य चिन्ता से कोई लेना देना नहीं है. उनकी मुख्य चिन्ता यह है कि जो भाषाएं मरने के कगार पर खड़ी हैं उन्हें कैसे बचाया जाए ? किन्तु भोजपुरी की राजनीति करने वालों को तो हर हाल में अपना ही स्वार्थ दिखाई देता है. गणेश एन. देवी ने भोजपुरी को तेजी से विकसित होने वाली भाषा कहा, मानो उसे आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित कर दिया. आठवीं अनुसूची में शामिल होना तो आरक्षण की तरह है. जो जातियां आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सबसे ज्यादा पिछड़ी हैं उन्हें आरक्षण का लाभ देकर उन्हें मुख्य धारा में लाना सरकार का उद्देशय होता है. इस तरह जो भाषाएं मरने के कगार पर खड़ी हैं, आरक्षण का लाभ तो उन्हें मिलनी चाहिए. ‘सबसे तेजी से विकसित होने वाली भाषा’ को आरक्षण की क्या जरूरत ? वैसे भी, भोजपुरी जबतक हिन्दी का अंग बनकर हिन्दी के साथ जुड़ी हुई है तब तक उसका विस्तार वैश्विक है, और वह दुनिया के उन सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढ़ाई जाती है जहाँ हिन्दी विभाग कायम हैं. अगर हिन्दी से अलग होकर भोजपुरी, संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल हो गई तो उसके साहित्य को नियमत: हिन्दी के पाठ्यक्रमों से निकालना पड़ेगा और तब भोजपुरी के कबीरदास वहीं पढ़ाए जाएंगे जहाँ सिर्फ भोजपुरी का पाठ्यक्रम रहेगा. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए ?
    भोजपुरी की राजनीति करके अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने वाले लोग किस तरह देश की जनता को भ्रमित कर रहे हैं इसका उदाहरण ‘जन भोजपुरी मंच’ नामक संगठन का निम्न आह्वान है, “ भोजपुरी के लड़ाई खाली भोजपुरी के लड़ाई ना हवे. इ सगरी भारतीय भसवन के सम्मान के लड़ाई ह. “. “ जय भोजपुरी बोली ले जा- जय भोजपुरी के मतलब ह सगरी भारतीय भासन के जय.”
    वास्तव में भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करने की मांग अर्थ है हिन्दी परिवार से बँटवारा करके अपना अलग घर बसा लेने की मांग. यह भला सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान की लड़ाई कैसे है ? इतना ही नहीं, एक ओर भोजपुरी की लड़ाई को सारी भारतीय भाषाओं का सम्मान कहना तो वहीं दूसरी ओर यह कहना, कि “ भोजपुरी दुनिया की सबसे मीठी भाषा है. जिसका विकल्प कोई भाषा नहीं हो सकती.” इस तरह का कथन दूसरी भाषाओं की उपेक्षा और उनका अपमान है. हर व्यक्ति को अपनी भाषा सबसे अधिक प्रिय, मीठी और सरल लगती है. मुझे खुद बांग्ला का माधुर्य मुग्ध कर देता है।

– डॉ. अमरनाथ

बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध क्यों हो रहा है?

कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर और हिंदी बचाओ मंच के संयोजक डॉक्टर अमरनाथ बता रहे हैं कि भोजपुरी और राजस्थानी जैसी हिंदी की बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल क्यों नहीं किया जाना चाहिए.

hindi

विगत 14 जुलाई 2017 को ‘हिंदी बचाओ मंच’ की ओर से एक प्रतिनिधि मंडल माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार राजनाथ सिंह से उनके आवास पर मिला.

प्रतिनिधि मंडल में मेरे अलावा, प्रख्यात पत्रकार राहुल देव, पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि, प्रख्यात साहित्यकार चित्रा मुद्गल, मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, ‘प्रवासी संसार’ के संपादक राकेश पाण्डेय और दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. दर्शन पाण्डेय मौजूद थे.

हमने गृह मंत्री जी से कहा कि हमारी हिंदी आज टूटने के कगार पर है. भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज हो गई है.

कुछ सांसदों ने संसद में बार-बार यह मांग की दुहराई है. भोजपुरी के कलाकार और दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष सांसद मनोज तिवारी ने पिछले महीने दिल्ली में एनबीटी से एक खास बातचीत में बताया कि हिंदी की दो बोलियों- भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का फैसला ले लिया गया है.

ऐसी दशा में हमारी चिंता है कि यदि समय रहते हमने इस बिल के पीछे छिपी साम्राज्यवाद की साजिश और चंद स्वार्थी लोगों के कुचक्र का पर्दाफाश नहीं किया तो हमें डर है कि निकट भविष्य में यह बिल संसद में आ सकता है और यदि पास हो गया तो हमारी हिंदी टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगी और तब अंग्रेज़ी का एकछत्र वर्चस्व कायम हो जाएगा.

यह इस देश की अखंडता के खिलाफ तो होगा ही, व्यापक आम जनता के हित के भी प्रतिकूल होगा.

हमने इसी संदर्भ में माननीय गृह मंत्री जी से भेंट की, उन्हें वस्तुस्थिति बताने की कोशिश की और एक ज्ञापन भी दिया. मैं उस ज्ञापन को यहां यथावत प्रस्तुत कर रहा हूं-

सेवा में,

श्री राजनाथ सिंह जी

माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार.

विषय : भोजपुरी, राजस्थानी अथवा हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न किया जाए.

महोदय,

हमारी हिंदी टूटने के कगार पर है. निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोग भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. भोजपुरी के कलाकार और सांसद तथा दिल्ली के भाजपा के अध्यक्ष श्री मनोज तिवारी ने भी इस तरह का बयान दिया है कि हिंदी की दो बोलियों (भोजपुरी और राजस्थानी) को शीघ्र ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा.

इस मांग के पक्ष में जो तर्क दिए जा रहे हैं वे सभी तर्क तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्ट, मिथ्या और भ्रामक हैं. उदाहरणार्थ भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है.

हिंदी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिंदी भी. लिखने-पढ़ने का सारा काम हम लोग हिंदी में करते है?

ऐसी दशा में हमें सिर्फ भोजपुरी भाषी या अवधी भाषी कहना न्यायसंगत नहीं है. इसीलिए राजभाषा नियम 1976 के अनुसार हमें ‘क’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बंटने के बावजूद हमें ‘हिंदी भाषी’ कहा गया है.

वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की कुल संख्या लगभग 3,30,99497 ही है.

इतना ही नहीं, भोजपुरी हिंदी का अभिन्न अंग है, वैसे ही जैसे राजस्थानी, अवधी, ब्रज आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी- पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिंदी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है.

हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रजी, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिंदी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

क्या भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वाले मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून आदि की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएंगे? तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक हम इन विषयों की पढ़ाई हिंदी में करा पाने में सफल नहीं हो सके.

ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिंदी की रोटी खाते हैं और मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनके आसपास की जनता गंवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.

इस तरह की मांग करने वालों का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी को कोई क्षति नहीं होगी. हिंदी को होने वाली क्षति का बिन्दुवार विवरण हम यहां दे रहे हैं.

संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से हिंदी को होने वाली क्षति –

भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी भाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या घट जाएगी. मैथिली की संख्या हिंदी में से घट चुकी है.

स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिंदी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिंदी से छिनते देर नहीं लगेगी.

भोजपुरी के अलग होते ही ब्रजी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं हैं.

ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिंदी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिंदी का स्थान दूसरा रहता था.

हिंदी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूंढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है.

साम्राज्यवादियों द्वारा हिंदी की एकता को खंडित करने के षड्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेज़ी के वर्चस्व से है. अंग्रेज़ी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे-धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है.

उसके सामने हिंदी ही तनकर खड़ी हो सकती है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेज़ी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?

भोजपुरी की समृद्धि से हिंदी को और हिंदी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बांट लेना है. भोजपुरी तब हिंदी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बांग्ला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि.

आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिंदी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? क्योंकि तब कबीर हिंदी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए?

भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की ?

कमज़ोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बंटने से लोग कमज़ोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमज़ोर होगी और हिंदी भी.

इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिंदी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को स्थान दिलाने की मांग आज भी लंबित है. यदि हिंदी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?

स्वतंत्रता के बाद हिंदी की व्याप्ति हिंदीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिंदी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिंदी भाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिंदीतर भाषी राज्य भी हैं.

अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिंदी का संख्या-बल घटा तो वहां की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहां हिंदी के पाठ्यक्रम जारी रखे जाएं या नहीं.

इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केंद्रीय हिंदी संस्थान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय अथवा विश्व हिंदी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

भोजपुरी और राजस्थानी के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होते ही इन्हें स्वतंत्र विषय के रूप में यूपीएससी के पाठ्यक्रम में शामिल करना पड़ेगा. इससे यूपीएससी पर अतिरिक्त बोझ तो पड़ेगा ही, देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित इस सेवा का स्तर भी गिरेगा.

परीक्षा के लिए भोजपुरी, राजस्थानी आदि को विषय के रूप में चुनने वालों के पास सीमित पाठ्यक्रम होगा और उनकी उत्तर पुस्तिकाएं जांचने वाले भी गिने चुने स्थानीय परीक्षक होंगे.

अनुभव यही बताता है कि भाषा को मान्यता मिलने के बाद ही अलग राज्य की मांग होने लगती है. मैथिली को सन् 2003 में आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया और उसके बाद से ही मिथिलांचल की मांग की जा रही है.

महोदय, भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

 महोदय, अधोहस्ताक्षरित हम सभी तथा देश की व्यापक प्रबुद्ध जनता

हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के विरुद्ध है और इस विषय में वह यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में है.

हम इसके समर्थन में निम्नलिखित सामग्री आप के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं-

‘हिंदी बचाओ मंच’ से संबंधित तथा समाचार पत्रों में प्रकाशित सामग्री का उपलब्ध अंश (50 पृष्ठ)
2940 (दो हचार नौ सौ चालीस) प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा हस्ताक्षरित प्रपत्र की पहली किस्त.

गृह मंत्री जी से हमारी भेंट की खबर अखबारों में आई और हमने फेसबुक पर भी पोस्ट कर दिया. इसके बाद सिर्फ मेरे फेसबुक एकाउंट पर तीन दिन के भीतर लगभग आठ सौ प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं- कुछ विरोध में और ज्यादातर पक्ष में.

मेरे लिए उन सब प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करना संभव नहीं है किन्तु मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि विरोध वे लोग कर रहे हैं जिनका कुछ न कुछ निजी स्वार्थ है, जिन्हें लगता है कि भोजपुरी या राजस्थानी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से उन्हें कोई न कोई पुरस्कार मिलेगा या छोटी-मोटी दूसरी सुविधाएं.

इस बीच राजस्थानी और भोजपुरी से एमए की डिग्री हासिल करने वाले नौजवानों की एक बड़ी संख्या तैयार हो चुकी है जो नौकरियों की आस लगाए बैठी है, भले ही वह मृगमरीचिका ही साबित हो.

असल में जातीय चेतना जहां सजग और मजबूत नहीं होती वहां वह अपने समाज को विपथित भी करती हैं. समय-समय पर उसके भीतर विखंडनवादी शक्तियां सिर उठाती रहती हैं. विखंडन व्यापक साम्राज्यवादी षड्यंत्र का ही एक हिस्सा है. दुर्भाग्य से हिंदी जाति की जातीय चेतना मजबूत नहीं है और इसीलिए वह लगातार टूट रही है.

अस्मिताओं की राजनीति आज के युग का एक प्रमुख साम्राज्यवादी एजेंडा है. साम्राज्यवाद यही सिखाता है कि थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली. जब संविधान बना तो मात्र 13 भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल थीं. फिर 14, 18  और अब 22 हो चुकी हैं.

अकारण नहीं है कि जहां एक ओर दुनिया ग्लोबल हो रही है तो दूसरी ओर हमारी भाषाएं यानी अस्मिताएं टूट रही हैं और इसे अस्मिताओं के उभार के रूप में देखा जा रहा है.

हमारी दृष्टि में ही दोष है. इस दुनिया को कुछ दिन पहले जिस प्रायोजित विचारधारा के लोगों द्वारा गलोबल विलेज कहा गया था उसी विचारधारा के लोगों द्वारा हमारी भाषाओं और जातीयताओं को टुकड़ों-टुकड़ों में बांट करके कमज़ोर किया जा रहा है.

भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग समय-समय पर संसद में होती रही है. मामला सिर्फ भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने का नहीं है.

मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ ने 28 नवंबर 2007 को अपने राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी घोषित किया और विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की. यही स्थिति राजस्थानी की भी है.

हकीकत यह है कि जिस राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोरों से की जा रही है उस नाम की कोई भाषा वजूद में है ही नहीं.

राजस्थान की 74 में से सिर्फ 9 ( ब्रजी, हाड़ौती, बागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी) बोलियों को राजस्थानी नाम देकर संवैधानिक दर्जा देने की मांग की जा रही है. बाकी बोलियों पर चुप्पी क्यों?

इसी तरह छत्तीसगढ़ में 94  बोलियां हैं जिनमें सरगुजिया और हालवी जैसी समृद्ध बोलियां भी हैं. छत्तीसगढ़ी को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ने वालों को इन छोटी-छोटी उप-बोलियां बोलने वालों के अधिकारों की चिंता क्यों नहीं है?

पिछली सरकार के केंद्रीय गृहराज्य मंत्री नवीन जिंदल ने लोकसभा में एक चर्चा को दौरान कुमांयूनी-गढ़वाली को संवैधानिक दर्जा देने का आश्वासन दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यदि हरियाणा सरकार हरियाणवी के लिए कोई संस्तुति भेजती है तो उस पर भी विचार किया जाएगा.

मैथिली तो पहले ही शामिल हो चुकी है. फिर अवधी और ब्रजी ने कौन सा अपराध किया है कि उन्हें आठवीं अनुसूची में जगह न दी जाए जबकि उनके पास ‘रामचरितमानस’ और ‘पद्मावत’ जैसे ग्रंथ है?

हिंदी साहित्य के इतिहास का पूरा मध्य काल तो ब्रज भाषा में ही लिखा गया. इसी के भीतर वह कालखंड भी है जिसे हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग (भक्ति काल) कहते हैं.

भागलपुर विश्वविद्यालय में अंगिका में भी एमए की पढ़ाई होती है. मैने वहां के एक शिक्षक से पूछा कि अंगिका में एमए की पढ़ाई करने वालों का भविष्य क्या है? उन्होंने बताया कि उन्हें सिर्फ डिग्री से मतलब होता है विषय से नहीं.

एमए की डिग्री मिल जाने से एलटी ग्रेड के शिक्षक को पीजी (प्रवक्ता) का वेतनमान मिलने लगता है. वैसे नियमित कक्षाएं कम ही चलती हैं. जिन्हें डिग्री की लालसा होती है वे ही प्रवेश लेते हैं और अमूमन सिर्फ परीक्षा देने आते हैं.

जिस शिक्षक से मैंने प्रश्न किया उनका भी एक उपन्यास कोर्स में लगा है जिसे इसी उद्देश्य से उन्होंने अंगिका में लिखा है मगर हैं वे हिंदी के प्रोफेसर. वे रोटी तो हिंदी की खाते हैं किन्तु अंगिका को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसके पीछे उनका यही स्वार्थ है.

अंगिका के लोग अपने पड़ोसी मैथिली वालों पर आरोप लगाते हैं कि उन लोगों ने जिस साहित्य को अपना बताकर पेश किया है और संवैधानिक दर्जा हासिल किया है उसका बहुत सा हिस्सा वस्तुत: अंगिका का है.

इस तरह पड़ोस की मैथिली ने उनके साथ धोखा किया है. यानी, बोलियों के आपसी अंतर्विरोध. अस्मिताओं की वकालत करने वालों के पास इसका क्या जवाब है?

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हिंदुस्तान की कौन सी भाषा है जिसमें बोलियां नहीं हैं? गुजराती में सौराष्ट्री, गामड़िया, खाकी, आदि, असमिया में क्षखा, मयांग आदि, ओड़िया में संभलपुरी, मुघलबंक्षी आदि, बंगला में बारिक, भटियारी, चिरमार, मलपहाड़िया, सामरिया, सराकी, सिरिपुरिया आदि, मराठी में गवड़ी, कसारगोड़, कोस्ती, नागपुरी, कुड़ाली आदि.

इनमें तो कहीं भी अलग होने का आंदोलन सुनाई नहीं दे रहा है. बांग्ला तक में नहीं, जहां अलग देश है. मैं बांग्ला में लिखना-पढ़ना जानता हूं किन्तु ढाका की बंगला समझने में बड़ी असुविधा होती है.

फिर भी बंगलादेश और पश्चिम बंगाल दोनों की बांग्ला एक ही है. रवीन्द्रनाथ और नजरुल इस्लाम जैसे वहां पढ़े-पढ़ाए जाते हैं वैसे ही हमारे देश में भी.

अस्मिताओं की राजनीति करने वाले कौन लोग हैं ? कुछ गिने-चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार. नेता जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए.

उन्हें पता होता है कि किस तरह अपनी भाषा और संस्कृति की भावनाओं में बहाकर गांव की सीधी-सादी जनता का मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है.

इसी तरह भोजपुरी का अभिनेता रवि किशन यदि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संसद के सामने धरना देने की धमकी देता है तो उसका निहितार्थ समझ में आता है क्योकि, एक बार मान्यता मिल जाने के बाद उन जैसे कलाकारों और उनकी फिल्मों को सरकारी खजाने से भरपूर धन मिलने लगेगा.

शत्रुघ्न सिन्हा ने लोकसभा में यह मांग उठाते हुए दलील दी थी कि इससे भोजपुरी फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और वैधानिक दर्जा दिलाने में काफी मदद मिलेगी.

विगत 3 मार्च 2017 को बिहार की कैबिनेट ने सर्वसम्मति से इस आशय का प्रस्ताव पारित करके भारत के गृह मंत्री को भेजा है कि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए.

उस पत्र में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि इससे राजभाषा हिंदी पर क्या प्रभाव पड़ेगा. आश्चर्य तो यह देखकर हुआ कि बिहार के मुख्य सचिव द्वारा हस्ताक्षरित उस पत्र में आल्हा सहित तुलसी और नागार्जुन जैसे कवियों को भोजपुरी के खाते में डाल दिया गया है.

बोलियों को संवैधानिक मान्यता दिलाने में वे साहित्यकार सबसे आगे हैं जिन्हें हिंदी जैसी समृद्ध भाषा में पुरस्कृत और सम्मानित होने की उम्मीद टूट चुकी है. हमारे कुछ मित्र तो इन्हीं के बल पर हर साल दुनिया की सैर करते हैं और करोड़ों का वारा-न्यारा करते हैं.

स्मरणीय है कि नागार्जुन को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी मैथिली कृति पर मिला था किसी हिंदी कृति पर नहीं. बुनियादी सवाल यह है कि आम जनता को इससे क्या लाभ होगा?

मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हुए 14 साल हो गए. कितनी नौकरियां सृजित हुईं? मैथिली माध्यम वाले कितने प्राथमिक विद्यालय खुले और उनमें कितने बच्चों का पंजीकरण हुआ? हां, कुछ लोग पुरस्कृत जरूर हो गए.

hindi writer

गृहमंत्री से मुलाकात करने वाले हिंदी के साहित्यकार. (फोटो क्रेडिट: अमरनाथ/फेसबुक)

एक ओर तो उत्तरांचल जैसे हिंदी भाषी राज्यों में सभी सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेज़ी माध्यम लागू करना और इस तरह देश के ऊपर के उच्च-मध्य वर्ग को अंग्रेज बनाने की योजना और दूसरी ओर गरीब-गंवार जनता को उसी तरह कूप मंडूक बनाए रखने की साजिश. इस साजिश में कॉरपोरेट दुनिया की क्या और कितनी भूमिका है–यह शोध का विषय है. मुझे उम्मीद है कि निष्कर्ष चौंकाने वाले होंगे.

वस्तुत: साम्राज्यवाद की साजिश हिंदी की शक्ति को खण्ड-खण्ड करने की है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी, दुनिया की सबसे बड़ी दूसरे नंबर की भाषा है. इस देश में अंग्रेज़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिंदी ही है.

इसलिए हिंदी को कमज़ोर करके इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता को, इस देश की रीढ़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है. अस्मिताओं की राजनीति के पीछे साम्राज्यवाद की यही साजिश है.

जो लोग बोलियों की वकालत करते हुए अस्मिताओं के उभार को जायज ठहरा रहे हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, खुद व्यवस्था से सांठ-गांठ करके उसकी मलाई खा रहे हैं और अपने आसपास की जनता को जाहिल और गंवार बनाए रखना चाहते हैं ताकि भविष्य में भी उन पर अपना वर्चस्व कायम रहे.

जिस देश में खुद राजभाषा हिंदी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो वहां भोजपुरी, राजस्थानी, और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देकर वे उन्हें क्या बनाना चाहते हैं?

जिस भोजपुरी, राजस्थानी या छत्तीसगढ़ी का कोई मानक रूप तक तय नहीं है, जिसके पास गद्य तक विकसित नहीं हो सका है उस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराकर उसमें मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की उम्मीद करने के पीछे की धूर्त मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है.

अगर बोलियों और उसके साहित्य को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उसके साहित्य को पाठ्यक्रमों में शामिल कीजिए, उनमें फिल्में बनाइए, उनका मानकीकरण कीजिए.

उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिंदी से अलग कर देना और उसके समानान्तर खड़ा कर देना तो उसे और हिंदी, दोनों को कमज़ोर बनाना है और उन्हें आपस में लड़ाना है.

मैं बंगाल में रहता हूं. बंगाल की दुर्गा पूजा मशहूर है. मैं जब भी हिंदी के बारे में सोचता हूं तो मुझे दुर्गा का मिथक याद आता है. दुर्गा बनी कैसे? महिषासुर से त्रस्त सभी देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए थे.

‘अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजम्. एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा.’ अर्थात् सभी देवताओं के शरीर से प्रकट हुए उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी. एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया और अपने प्रकाश से तीनों लोकों में व्याप्त हो गया. तब जाकर महिषासुर का वध हो सका.

हिंदी भी ठीक दुर्गा की तरह है. जैसे सारे देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए और दुर्गा बनी वैसे ही सारी बोलियों के समुच्चय का नाम हिंदी है. यदि सभी देवता अपने-अपने तेज वापस ले लें तो दुर्गा खत्म हो जाएगी, वैसे ही यदि सारी बोलियां अलग हो जाएं तो हिंदी के पास बचेगा क्या?

हिंदी का अपना क्षेत्र कितना है? वह दिल्ली और मेरठ के आसपास बोली जाने वाली कौरवी से विकसित हुई है. हम हिंदी साहित्य के इतिहास में चंदबरदायी और मीरा को पढ़ते हैं जो राजस्थानी के हैं, सूर को पढ़ते हैं जो ब्रजी के हैं, तुलसी और जायसी को पढ़ते हैं जो अवधी के हैं, कबीर को पढ़ते हैं जो भोजपुरी के हैं और विद्यापति को पढ़ते हैं जो मैथिली के हैं. इन सबको हटा देने पर हिंदी साहित्य में बचेगा क्या?

अपने पड़ोसी नेपाल में सन 2001 में जनगणना हुई थी. उसकी रिपोर्ट के अनुसार वहां अवधी बोलने वाले 2.47 प्रतिशत, थारू बोलने वाले 5.83 प्रतिशत, भोजपुरी बोलने वाले 7.53 प्रतिशत और सबसे अधिक मैथिली बोलने वाले 12.30 प्रतिशत हैं.

वहां हिंदी बोलने वालों की संख्या सिर्फ 1 लाख 5 हजार है. यानी, बाकी लोग हिंदी जानते ही नहीं. मैंने कई बार नेपाल की यात्रा की है. काठमांडू में भी सिर्फ हिंदी जानने से काम चल जाएगा. नेपाल में एक करोड़ से अधिक सिर्फ मधेसी मूल के हैं.

भारत से बाहर दक्षिण एशिया में सबसे अधिक हिंदी फिल्में यदि कहीं देखी जाती हैं तो वह नेपाल है. ऐसी दशा में वहां हिंदी भाषियों की संख्या को एक लाख पांच हजार बताने से बढ़कर बेईमानी और क्या हो सकती है? हिंदी को टुकड़ों-टुकड़ों में बांटकर जनगणना करायी गई और फिर अपने अनुकूल निष्कर्ष निकाल लिया गया.

ठीक यही साजिश भारत में भी चल रही है. हिंदी की सबसे बड़ी ताकत उसकी संख्या है. इस देश की आधी से अधिक आबादी हिंदी बोलती है और यह संख्या बल बोलियों के नाते है. बोलियों की संख्या मिलकर ही हिंदी की संख्या बनती है.

यदि बोलियां आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं तो आने वाली जनगणना में मैथिली की तरह भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि को अपनी मातृभाषा बताने वाले हिंदी भाषी नहीं गिने जाएंगे और तब हिंदी तो मातृ-भाषा बताने वाले गिनती के रह जाएंगे.

हिंदी की संख्या बल की ताकत स्वत: खत्म हो जाएगी और तब अंग्रेज़ी को भारत की राजभाषा बनाने के पक्षधर उठ खड़े होंगे और उनके पास उसके लिए अकाट्य वस्तुगत तर्क होंगे. ( अब तो हमारे देश के अनेक काले अंग्रेज बेशर्मी के साथ अंग्रेज़ी को भारतीय भाषा कहने भी लगे हैं.)

उल्लेखनीय है कि सिर्फ संख्या-बल की ताकत पर ही हिंदी, भारत की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है.

मित्रो, हिंदी क्षेत्र की विभिन्न बोलियों के बीच एकता का सूत्र यदि कोई है तो वह हिंदी ही है. हिंदी और उसकी बोलियों के बीच परस्पर पूरकता और सौहार्द का रिश्ता है.

हिंदी इस क्षेत्र की जातीय भाषा है जिसमे हम अपने सारे औपचारिक और शासन संबंधी कामकाज करते हैं. यदि हिंदी की तमाम बोलियां अपने अधिकारों का दावा करते हुए संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं तो हिंदी की राष्ट्रीय छवि टूट जाएगी और राष्ट्रभाषा के रूप में उसकी हैसियत भी संदिग्ध हो जाएगी.

इतना ही नहीं, इसका परिणाम यह भी होगा कि मैथिली, ब्रजी, राजस्थानी आदि के साहित्य को विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों से हटाने के लिए हमें विवश होना पड़ेगा.

विद्यापति को अब तक हम हिंदी के पाठ्यक्रम में पढ़ाते आ रहे थे. अब हम उन्हें पाठ्यक्रम से हटाने के लिए बाध्य हैं. अब वे सिर्फ मैथिली के कोर्स में पढ़ाए जाएंगे. क्या कोई साहित्यकार चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए?

हिंदी (हिंदुस्तानी) जाति इस देश की सबसे बड़ी जाति है. वह दस राज्यों में फैली हुई है. इस देश के अधिकांश प्रधानमंत्री हिंदी जाति ने दिए हैं. भारत की राजनीति को हिंदी जाति दिशा देती रही है.

इसकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करना है. इनकी बोलियों को संवैधानिक दर्जा दो. इन्हें एक-दूसरे के आमने-सामने करो. इससे एक ही तीर से कई निशाने लगेंगे.

हिंदी की संख्या बल की ताकत स्वत: खत्म हो जाएगी. हिंदी भाषी आपस में बंटकर लड़ते रहेंगे और ज्ञान की भाषा से दूर रहकर कूपमंडूक बने रहेंगे. बोलियां हिंदी से अलग होकर अलग-थलग पड़ जाएंगी और स्वत: कमज़ोर पड़कर खत्म हो जाएंगी.

मित्रो, चीनी का सबसे छोटा दाना-पानी में सबसे पहले घुलता है. हमारे ही किसी अनुभवी पूर्वज ने कहा है, ‘अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च. अजा पुत्रं बलिं दद्यात दैवो दुर्बल घातक:.’

अर्थात् घोड़े की बलि नहीं दी जाती, हाथी की भी बलि नही दी जाती और बाघ के बलि की तो कल्पना भी नही की जा सकती. बकरे की ही बलि दी जाती है. दैव भी दुर्बल का ही घातक होता है.

अब तय हमें ही करना है कि हम बाघ की तरह बनकर रहना चाहते हैं या बकरे की तरह.

हम सबसे पहले अपने माननीय सांसदों एवं अन्य जनप्रतिनिधियों से प्रार्थना करते हैं कि वे अत्यंत गंभीर और दूरगामी प्रभाव डालने वाली इस आत्मघाती मांग पर पुनर्विचार करें और भावना में न बहकर अपनी राजभाषा हिंदी को टूटने से बचाएं.

हम हिंदी समाज के अपने बुद्धिजीवियों से साम्राज्यवाद और ब्यूरोक्रेसी की मिलीभगत से रची जा रही इस साजिश से सतर्क होने और एकजुट होकर इसका पुरजोर विरोध करने की अपील करते हैं.

 (द वायर से साभार)

हिंदी के टूटने से देश की भाषिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी

hindi

हिंदी की बोलियों को लेकर अपने निहित स्वार्थ के लिए जो हिंदी को तोड़ने का उपक्रम कर रहे हैं वे देश की भाषिक व्यवस्था के समक्ष गहरा संकट उपस्थित कर रहे हैं.

इस संदर्भ में हिंदी के तमाम बुद्धिजीवी डॉ. अमरनाथ के साथ हैं. इस संदर्भ में मेरा मानना है कि आज हिंदी के समक्ष एक ऐतिहासिक संकट उत्पन्न किया जा रहा है. इसके क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ कार्य कर रहे हैं. वस्तुतः जिसे हम इस देश की राजभाषा हिंदी कहते हैं वह अनेक बोलियों का समुच्चय है.

हिंदी की यही बोलियां उसकी प्राणधारा हैं जिनसे वह शक्तिशालिनी बनकर विश्व की सबसे बड़ी भाषाओं में से एक बनी है लेकिन जो बोलियां विगत 1300 वर्षों से हिंदी का अभिन्न अवयव रही हैं उन्हें कतिपय स्वार्थी तत्व अलग करने का प्रयास कर रहे हैं.

ऐसी स्थिति में हमें एकजुट होकर हिंदी को टूटने से बचाना चाहिए अन्यथा देश की सांस्कृतिक व भाषिक व्यवस्था चरमरा जाएगी. यह विचारणीय है कि हिंदी और उसकी तमाम बोलियां अपभ्रंश के सात रूपों से विकसित हुई हैं और वे एक दूसरे से इतनी घुलमिल गयी हैं कि वे परस्पर पूरकता का अद्भुत उदाहरण हैं.

यह भी सच है कि हिंदी के भाग्य में सदैव संघर्ष लिखा है. वह संतों, भक्तों से शक्ति प्राप्त करके लोक शक्ति के सहारे विकसित हुई है. आज विश्व की नवसाम्राज्यवादी ताकतें हिंदी को तोड़ने का उपक्रम कर रही हैं.

वे भलीभांति जानती हैं कि यदि हिंदी इसी गति से बढ़ती रहेगी तो विश्व की बड़ी भाषाओं मसलन मंदारिन, अंग्रेजी, स्पैनिश, अरबी इत्यादि के समक्ष एक चुनौती बन जाएगी और इंग्लैंड को आज यह भय सता रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि 2050 तक अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी वहां की प्रमुख भाषा बन जाए.

अभी कुछ समय पहले पंजाबी कनाडा की दूसरी राजभाषा बना दी गई है. दूसरी ओर आज हिंदी मानव संसाधन की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बन गयी है. हिंदी चैनलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. बाजार की स्पर्धा के कारण ही सही अंग्रेजी चैनलों का हिंदी में रूपांतरण हो रहा है.

इस दौर में वेब-लिंक्स और गूगल सर्किट का बोलबाला है. इस समय हिंदी में भी एक लाख से ज्यादा ब्लॉग सक्रिय हैं. अब सैकड़ों पत्र- पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं.

गूगल का स्वयं का सर्वेक्षण भी बताता है कि विगत एक वर्ष में सोशल मीडिया पर हिंदी में 94 प्रतिशत सामग्री में इजाफा हुआ है जबकि अंग्रेजी में केवल 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

यह इस बात का द्योतक है कि हिंदी न केवल विश्व भाषा बन गयी है अपितु वैश्वीकरण के संवहन में अपनी प्रभावी भूमिका अदा कर रही है. हिंद और हिंदी की विकासमान शक्ति विश्व के समक्ष एक प्रभावी मानक बन रहे हैं फलतः कतिपय स्वार्थी तत्व हिंदी को तोड़ने में संलग्न हो गये हैं.

वे जानते हैं कि हिंदी बाहर की तमाम चुनौतियों का सामना करने के लिए सन्नद्ध हो रही है. यदि उसे कमजोर करना है तो बोलियों से उसका संघर्ष कराना होगा. इस लक्ष्य से परिचालित होकर इस समय हिंदी की 38 बोलियां संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए प्रयासरत हैं.

यदि ऐसा होता है तो न केवल हिंदी कमजोर होगी अपितु हिंदी के बृहत्तर परिवार से कटते ही उन बोलियों का भविष्य भी अनिश्चित हो जाएगा. आखिर जो विषय साहित्य, समाज, भाषा विज्ञान और मनीषी चिंतकों का है उसे राजनीतिक रंग क्यों दिया जा रहा है. अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी कह दिया है कि कोई भी राजनीतिक दल जाति, धर्म और भाषा के आधार पर मत नहीं मांग सकता.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब संविधान निर्माताओं ने देश की राजभाषा के रूप में हिंदी का सर्वसम्मति से चयन किया था तो उन्होंने स्वेच्छा से देश हित में बोलियों का बलिदान करवाया था.

यह सारा देश जानता है कि हिंदी अपने संख्याबल के कारण भारत की राजभाषा है और इसी ताकत के बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल कर सकती है.

लोकतंत्र में संख्या बल के महत्व से सभी परिचित हैं. यदि भोजपुरी, राजस्थानी समेत हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो हिंदी चिंदी-चिंदी होकर बिखर जाएगी और संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का लक्ष्य ध्वस्त हो जाएगा.

इससे हिंद और हिंदी के सांस्कृतिक-भाषिक बिखराव की अंतहीन प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी जिसे कोई भी सरकार संभाल नहीं पाएगी. यहां तक कि गांधी, सुभाष, विनोबा भावे समेत तमाम विभूतियों का संघर्ष और स्वप्न मिट्टी में मिल जाएगा.

जो कार्य अंग्रेज दो सौ वर्षों के शासन के द्वारा नहीं कर सके वह हमारे बीच के कतिपय स्वार्थी तत्व साकार कर देंगे अर्थात 2050 तक अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या हिंदी बोलने वालों की संख्या से ज्यादा हो जाएगी और हिंदी को बेदखल करके अंग्रेजी को सदा सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित कर दिया जाएगा.

हमारी हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता अपनी पहचान खो बैठेगी. इसलिए देशवासियों को जागने और तत्पर होने की जरूरत है. हिंदी के टूटने से देश की भाषिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और देश को भावनात्मक एकता के सूत्र पिरोने वाला तंतु कमजोर हो जाएगा.

ऐसी स्थिति में देश की सांस्कृतिक व्यवस्था भी बिखर जाएगी जिसकी फलश्रुति देश की बौद्धिक परतंत्रता में होगी. जिस तरह गंगा अनेक सहायक नदियों से मिलकर ही सागर तक की यात्रा करती हैं और अपने साथ उन नदियों को भी सागर तक पहुंचाती है उसी तरह हिंदी से अलग होते ही बोलियों का अस्तित्व भी संकट में आ जाएगा.

हिंदी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की संवाहक है. वह राष्ट्रीय संपर्क और संवाद का एकमात्र माध्यम है. यदि हम इस माध्यम अथवा आधार को ही कमजोर कर देंगे तो देश अपने आप कमजोर हो जाएगा. हमारी भारतीयता कमजोर हो जाएगी.

आचार्य चाणक्य कहा करते थे कि भाषा, भवन, भेष और भोजन संस्कृति के निर्माणक तत्व हैं. यदि आज नई पीढ़ी चीनी व्यंजनों, मैकडोनाल्ड के बर्गर और पेप्सी-कोक पर लार टपकाती है, अंग्रेजों जैसा कपड़ा पहनती है तो भाषा ही एकमात्र साधन है जो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति की रक्षा कर सकती है.

मैं भारत सरकार और माननीय प्रधानमंत्री जी से आग्रह करता हूं कि यह भाषाई राजनीति केवल भोजपुरी और राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा देने से खत्म नहीं होगी. यह आरक्षण से भी ज्यादा खतरनाक खेल है जब तक सारी 38 बोलियों को भाषा का दर्जा नहीं मिल जाएगा तब तक वे संघर्षरत रहेंगी.

इसके बाद मराठी, गुजराती समेत दूसरी भाषाओं की बोलियां भी स्वतंत्र भाषा का दर्जा हासिल करने के लिए संघर्षरत होंगी. ऐसी स्थिति में भयावह भाषिक अराजकता फैल जाएगी जिससे निपटना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा.

केवल वोट की राजनीति के लिए हिंद और हिंदी के स्वाभिमान पर चोट न की जाए. उसे तोड़ा न जाए. आज जिस भोजपुरी का कोई मानक रूप नहीं है, कोई व्याकरण नहीं है, कोई साहित्यिक परंपरा नहीं है और जिसमें कोई दैनिक अखबार नहीं निकलता है, उसे हिंदी से अलग करने वाले आखिर किस पात्रता पर बात कर रहे हैं.

इस संदर्भ में महात्मा गांधी का कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि ‘जो वृत्ति इतनी वर्जनशील और संकीर्ण है कि हर बोली को चिरस्थायी बनाना और विकसित करना चाहती हो, वह राष्ट्र विरोधी और विश्व विरोधी है. मेरी विनम्र सम्मति में तमाम अविकसित और अलिखित बोलियों का बलिदान करके उन्हें हिंदी (हिंदुस्तानी) की बड़ी धारा में मिला देना चाहिए. यह देश हित के लिए दी गई कुर्बानी होगी आत्महत्या नहीं.’ यंग इंडिया, 27 अगस्त 1925.

इसी लक्ष्य को साकार करने का कार्य हमारे संविधान निर्माताओं ने किया है. इस महादेश में आंतरिक एकता तथा संवाद का एकमात्र माध्यम बनकर हिंदी ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है.

अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन के प्रथम अध्यक्ष डाॅ. विद्यानिवास मिश्र ने हिंदी का विभाजन शीर्षक आलेख में लिखा है, ‘जो बोलियों को आगे बढ़ाने की बात करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि ये बोलियां एक दूसरे के लिए प्रेषणीय होकर ही इन बोलियों के बोलने वालों के लिए महत्व रखती हैं, परस्पर विभक्त हो जाने पर इनका कौड़ी बराबर मोल न रह जाएगा.

भोजपुरी, अवधी, मैथिली, बुंदेली या राजस्थानी के लिए गौरव होने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हिंदी का अब तक का इतिहास, एक केंद्र निर्माता इतिहास झूठा हो जाए और इतने बड़े भू भाग के भाषा-भाषी एक दूसरे से बिराने होकर देश के विघटन के कारण बन जाएं.’

इस तरह हिंदी का संयुक्त परिवार अगर टूटता है तो देश भी कमजोर हो जाएगा. अतः व्यापक राष्ट्र हित में हमें हिंदी को मजबूत बनाना चाहिए और बोलियों को भाषा बनाने का क्षुद्र मोह छोड़ना चाहिए.

अंत में मैं माननीय प्रधानमंत्री जी से आग्रह करता हूं कि वे हिंदी को लेकर वाकई कुछ करना चाहते हैं तो उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाएं.

इससे न केवल हिंदी जगत उनका सदा सर्वदा के लिए आभारी हो जाएगा अपितु कम से कम दस साल के लिए उनका प्रधानमंत्री पद भी सुरक्षित हो जाएगा.

यदि वे योगदिवस के लिए विश्व के 170 देशों का समर्थन जुटा सकते हैं तो हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए 129 देशों के समर्थन की दरकार है. इसे वे आसानी से जुटा सकते हैं. उन्होंने विश्व भर में हिंदी में भाषण देकर उसके गौरव को बढ़ाया है.

साथ ही मैं देशवासियों से भी अपील करता हूं कि हमें भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता को अक्षुण्ण रखना है तो हिंदी को टूटने से बचाना होगा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है. इतिहास हमें तटस्थ रहने की छूट नहीं देगा. इस समय जो हिंदी का पक्ष नहीं लेगा उसे भावी पीढ़ियां क्षमा नहीं करेंगी.

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं)

आदरणीय श्यामरुद्र पाठक जी के भाषा संबंधी विचार -२५ सितंबर २०१६ )

मेरी जो मातृभाषा है, उस भाषा को कई लोग वज्जिका कहते हैं, परन्तु आम तौर पर हमलोग इसे मैथिली का ही एक प्रचलित रूप मानते हैं |

इसलिए जब मैथिली को संविधान की अष्टम अनुसूची में डाला गया, तो मुझे स्वाभाविक तौर पर ख़ुशी हुई |

लेकिन उपर्युक्त ख़ुशी की तुलना में बहुत ज्यादा दुःख, चिंता और तज्जनित उद्वेग तब हुआ जब मैंने पहली बार यह पढ़ा कि जनगणना आयोग अब मैथिली भाषियों को हिंदी भाषी नहीं मानता; अर्थात् जितने लोग मैथिली भाषी हैं, हिंदी भाषियों की संख्या उतनी कम मानी जा रही है |

भारत की भाषा समस्या से जुड़े हुए मुझ जैसे लोगों के लिए यह चिंता अब और भी विकराल होती जा रही है, जब यह सुनने को मिल रहा है कि अनेक लोग भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल करवाने के काम में लगे हुए हैं |

अगर मैथिली और भोजपुरी को हिंदी से काट कर देखना उचित है, तो अवधी, ब्रज-भाषा, मगधी, वज्जिका, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी, बुन्देलखंडी आदि भाषाओं को बोलने वाले लोगों को भी हिंदी न बोलने वाले लोगों के रूप में गिनती करने में क्या बुराई है ? तब हिंदी बोलने वालों की संख्या क्या मानी जाएगी ? तब अंग्रेज़ी के वर्चस्व के खिलाफ क्या कोई व्यावहारिक तर्क बचेगा ?

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में संविधान की अष्टम अनुसूची में उल्लिखित सभी भारतीय भाषाओं और भारतीयों को गुलाम बनाकर रखने वाले लोगों की भाषा अंग्रेज़ी में उत्तर पुस्तिकाओं में लिखने का विकल्प है | अगर ऊपर वर्णित परिपाटी चली तो क्या सिविल सेवा परीक्षा एक सौ भाषाओं में आयोजित होगी, या 1979 से पूर्ववत् पुनः सिर्फ अंग्रेज़ी माध्यम में ?

हिंदी बोलने वाले सभी लोग मैथिली नहीं बोलते और मैथिली नहीं समझते |
परन्तु मैथिली बोलने वाले सभी लोग हिंदी बोल सकते हैं और हिंदी समझ सकते हैं |

ऐसे-ऐसे दो-दो वाक्य भोजपुरी, अवधी, ब्रज-भाषा, मगधी, वज्जिका, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी, बुन्देलखंडी आदि भाषाओं के सन्दर्भ में भी सही है |

( आदरणीय #श्याम_रुद्र_पाठक जी के #भाषा संबंधी विचार
२५ सितंबर २०१६ )

 

प्रेस क्लब कोलकाता को संबोधित करते हुए हैं हिंदी बचाओ मंच के संयोजक डॉ. अमरनाथ शर्मा

डा.(प्रो.) अमर नाथ जी ने प्रेस क्लब कोलकाता में ‘मैं भारत हूँ’ पत्रिका (मुम्बई) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में ‘हिंदी बचाओ मंच’ के संयोजक के रूप में अपना वक्तव्य रखते हुए…कलमकारों से भरे सभागार में कहा कि, 8वीं अनुसूची में शामिल कर बोलियों को भाषा बनाने का कुचक्र हिंदी के खिलाफ़ खुला षणयंत्र है,हिंदी के पक्षधर अभी नहीं जागे तो फ़िर जागने का समय भी हाथ से निकल जायेगा | बोलियां हिंदी की शक्ति है,जब बोलियां भाषा का रूप लेकर हिंदी से अलग होती जायेंगीं तब हिंदी का संख्याबल भी सिकुड़ता जायेगा और एक दिन हिंदी अतीत की भाषा बन जाये तो आश्चर्य नहीं होगा |
मंचासीन अन्य विद्वतजनों के भाव वचन भी प्रो. अमर नाथ जी के कथन के समर्थन में ही थे |—–