साक्षात्कार

  • ‘हिंदी बचाओ मंच’ की संकल्पना के संबंध में डॉ. अमरनाथ द्वारा राजस्थान पत्रिका को १८ जून २०१७ को दिए गए साक्षात्कार की अविकल प्रस्तुति… 

प्रश्न: –‘हिन्दी बचाओ मंच’ का जन्म किस उद्देश्य को लेकर हुआ? क्या‘विजन’ है आपका इस मंच के साथ ? कहाँ तक पहुंची है ‘मंच’ की यात्रा ?
उत्तरः ‘हिन्दी बचाओ मंच’ का गठन इसी वर्ष 13 अगस्त को कलकत्ते में हुआ. दरअसल भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लगभग एक दशक से चल रही है. अनेक सांसद समय समय पर संसद में इस तरह की मांग करते रहे हैं. हम लोग कलकत्ते में ‘अपनी भाषा’ नामक संस्था के माध्यम से भारत की भाषा- समस्या पर वर्ष 2000 से ही काम कर रहे थे. हम भाषा संबंधी ज्वलंत मुद्दों पर तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित करते हैं जिनमें राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियां भी होती हैं, और संस्था की ओर से ‘भाषा विमर्श’ नाम की एक पत्रिका भी निकलती है. अपनी संस्था की बैठकों में हम इस विषय पर एकाधिक बार गंभीर विमर्श उन्हीं दिनों कर चुके थे जब सन् 2003 में श्री अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार ने हिन्दी की एक बोली मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया और इस तरह हिन्दी का पहली बार टुकड़े किए गए. अपनी संगोष्ठियों में अनेकश: विमर्श के बाद हमारा निष्कर्ष था कि बाजपेयी जी की सरकार ने मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिन्दी के खूबसूरत घर को बांटने का काम किया है. इससे हिन्दी कमजोर होगी और हिन्दी की दूसरी बोलियों की ओर से भी इस तरह की माँग उठेगी. हमारा आकलन सही साबित हुआ और बाद में भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, अंगिका, मगही, कुमायूंनी गढ़वाली आदि हिन्दी की अनेक बोलियों द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की मांग की जाने लगी, जिनमें सबसे मुखर मांग भोजपुरी और राजस्थानी के लिए थी. प्रभुनाथ सिंह, रघुबंशप्रसाद सिंह, संजय निरूपम, योगी आदित्यनाथ, मनोज तिवारी, शत्रुघन सिन्हा आदि सांसदों ने समय समय पर इस तरह की मांग संसद में की है, अर्जुनराम मेघवाल जी राजस्थानी के लिए लड़ रहे हैं.
पिछले अगस्त महीने में सोशल मीडिया में ‘जन भोजपुरी मंच’ नामक संगठन की सक्रियता की ओर हमारा ध्यान गया. यह संगठन एक अभियान चलाकर माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को ट्वीटर पर संदेश भेजकर भोजपुरी को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहा था. इसके अलावा भोजपुरी क्षेत्र के दो सांसदों ने दुबारा जोर शोर से संसद में यह माँग की. सोशल मीडिया से ही खबर मिली कि दिल्ली के जंतर मंतर पर 8 अगस्त को उन लोगों ने धरना भी दिया था. यह सब देखकर हमें लगा कि अब सिर्फ लेख लिखने और गोष्ठियाँ करने से काम नहीं चलेगा. हमें जनता के बीच जाना पड़ेगा और दूसरे माध्यम भी अपनाने पड़ेंगे. हमने विगत 13 अगस्त को कोलकाता में ‘हिन्दी बचाओ मंच’ का गठन किया और तय किया कि हम पूरी ताकत से हिन्दी को टूटने से बचाने की लड़ाई लड़ेंगे. हमें उम्मीद है कि हम अपने सांसदों, मंत्रियों और माननीय प्रधान मंत्री जी का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर खींचने में भी कामयाब होंगे.
प्रश्न : आप कह रहे हैं कि हिन्दी की बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से हिन्दी की एकता को खतरा है, किन्तु लोगों का कहना है कि यदि बोलियां मजबूत होंगी तो हिन्दी भी मजबूत होगी. खतरा कैसे ?
उत्तर : निस्संदेह बोलियों के मजबूत होने से हिन्दी भी मजबूत होगी किन्तु तभी तक जबतक बोलियां हिन्दी का अंग बनी रहेंगी. देखिए, जनगणना के समय हिन्दी क्षेत्र के लोग अमूमन अपनी बोलियों को मातृभाषा के रूप में लिखवाते हैं. जबतक बोलियाँ हिन्दी के साथ रहेंगी तबतक उसके बोलने वालों की गणना हिन्दी के अंतर्गत ही होगी किन्तु, जिस दिन कोई बोली संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाएगी उस दिन के बाद उसे अपनी मतृभाषा लिखाने वाले संवैधानिक आधार पर हिन्दी भाषी नहीं गिने जाएंगे. वे सिर्फ भोजपुरी-भाषी या राजस्थानी-भाषी आदि के रूप में गिने जाएंगे और उनकी जनसंख्या हिन्दी के भीतर नहीं शामिल होगी. फलस्वरूप हिन्दी की जनसंख्या घट जाएगी. 
किसी बोली के संविधान में शामिल होने से उसका स्वतंत्र अस्तित्व बन जाता है और उसकी मूल भाषा से उसका कोई संबंध नहीं रहता. जैसे कि मैथिली के संविधान में शामिल होने के बाद अब हिन्दी से उसका कोई संबंध नहीं और बंगला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि की तरह अब उसका स्वतंत्र अस्तित्व है. इससे मैथिली का चाहे जितना भी लाभ हुआ हो किन्तु इसका तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि हिन्दी भाषियों की जनसंख्या में से मैथिली भाषियों की जनसंख्या घट गई. यदि भोजपुरी संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल होगी तो हिन्दी की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या भी घ़ट जाएगी. इसी तरह यदि अन्य बोलियां भी शामिल हुईं तो उनकी संख्या भी घटेगी और इसी तरह यदि हिन्दी की बोलियां संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल होती रहीं तो हिन्दी की जनसंख्या नगण्य रह जाएगी. जनसंख्या ही एकमात्र आधार है जिनके बलपर हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर सुशोभित है. जिस दिन हिन्दी का संख्याबल कमजोर होगा उस दिन अंग्रेजी एक झटके में ही हिन्दी को राजभाषा के पद से पदच्युत कर देगी.
मैं जब भी हिन्दी के बारे में सोचता हूं तो मुझे दुर्गा का मिथक याद आता है. हिन्दी भी ठीक दुर्गा की तरह है. जैसे सारे देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए और दुर्गा बनी वैसे ही सारी बोलियों के समुच्चय का नाम हिन्दी है. यदि सभी देवता अपने-अपने तेज वापस ले लें तो दुर्गा खत्म हो जाएगी, वैसे ही यदि सारी बोलियां अलग हो जायँ तो हिन्दी के पास बचेगा क्या ? हिन्दी का अपना क्षेत्र कितना है ? वह दिल्ली और मेरठ के आस-पास बोली जाने वाली कौरवी से विकसित हुई है. हम हिन्दी साहित्य के इतिहास में चंदबरदायी और मीरा को पढ़ते है जो राजस्थानी के हैं, सूर को पढ़ते हैं जो ब्रजी के हैं, तुलसी और जायसी को पढ़ते हैं जो अवधी के हैं, कबीर को पढ़ते हैं जो भोजपुरी के हैं और विद्यापति को पढ़ते है जो मैथिली के हैं. ( अब विद्यापति को हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल करना असंवैधानिक है ) इन सबको हटा देने पर हिन्दी साहित्य में बचेगा क्या ?
हम बंगाल में रहते हैं और बंगला साहित्य से अच्छी तरह परिचित हैं. बंगला का साहित्य हिन्दी से कम समृद्ध नहीं है. हिन्दी में तो अब तक किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है. नोबेल पुरस्कार सिर्फ बंगला के रवीन्द्रनाथ टैगोर को मिल सका है. किन्तु संख्या की दृष्टि से हिन्दी का कोई मुकाबला नहीं है. हिन्दी दस राज्यों मे बोली जाती है. सिर्फ संख्याबल के कारण ही हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिन्दी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही अवधी, ब्रजी, छत्तीसगढ़ी, मगही, राजस्थानी, बुंदेली, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में हैं क्या? आठवीं अनुसूची में शामिल होने की माँग भयंकर आत्मघाती है. मुट्ठीभर लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके हमें धोखा दे रहे है.

प्रश्न: बोलियों को भाषा के रूप में मान्यता देने या दिलवाने के पीछे किन लोगों का स्वार्थ हो सकता है ?
उत्तर : तीन तरह के लोग हैं, कुछ नेता, कुछ अभिनेता और कुछ बोलियों के साहित्यकार. नेता, जिन्हें वोट चाहिए और वे अच्छी तरह जानते हैं कि मातृभाषा का मुद्दा बहुत संवेदनशील होता है और इसके बल पर आम जनता को बहुत आसानी से भावनाओं बहकाकर उनका मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है. नेताओं को सिर्फ वोट चाहिए इसके लिए वे किसी सीमा तक जा सकते हैं. दूसरे अभिनेता, शत्रुघ्न सिन्हा और मनोज तिवारी जैसे लोगों का अपना स्वार्थ है. शत्रुघ्न सिन्हा ने संसद में बयान दिया था कि यदि भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हुई तो भोजपुरी फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होने में मदद मिलेगी. भोजपुरी का कलाकार रवि किसन जब कहता है कि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए वह संसद के सामने धरना देने से भी नहीं हिचकेगा तो उसका मन्तव्य समझ मे आता है. और तीसरे, वे बोलियों के साहित्यकार हैं जिन्हें हिन्दी के विशाल साहित्य में प्रतिष्ठा मिलने की उम्मीद नहीं है और वे बोलियों में दूसरे तीसरे दर्जे का साहित्य लिखकर पुरस्कृत और स्म्मानित होना चाहते हैं. उन्हें पता है कि यदि भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हो गई तो साहित्य अकादमी का पुरस्कार उनकी भोजपुरी कृति को भी मिल सकता है और पुरस्कार की राशि तो उतनी ही होगी. 
जो लोग निजी स्वार्थ में हिन्दी का घर बाँटने की मांग कर रहे हैं हमें उनके असली चेहरे देश की प्रबुद्ध जनता के सामने लाना है, जनता को सच्चाई बतानी है. हमें बताना है कि भोजपुरी या दूसरी बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग करने वाले अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिन्दी की रोटी खाते हैं और बोलियों को मान्यता दिलाने की मांग के नाम पर अपने आस पास की जनता को गँवार ही बनाए रखना चाहते है ताकि उनपर अपना दबदबा बनाए रख सखें. जिस देश में हिन्दी ही अभी ज्ञान- विज्ञान की भाषा नहीं बन सकी है, वहाँ भोजपुरी माध्यम से मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई की माँग करने वालों की कुटिल चाल हमें जनता तक पहुँचानी है ताकि जनता खुद ऐसी माँग करने वालों के विरुद्ध खड़ी हो जाए. जिस भोजपुरी के पास अपना कोई मानक रूप तक नहीं है, अपनी कोई लिपि नहीं है, जिसके पास अपना गद्य तक विकसित नहीं हो सका है, जो अमूमन सिर्फ घर में बोली जाती है, उस भाषा को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करने की माँग दिमागी दिवालियापन नहीं कहा जा सकता बल्कि इसके पीछे चंद शातिर स्वार्थियों की घृणित चाल है. 
प्रश्न : भूमंडलीकरण के दौर में इस तरह के विखंडन की मांग को आप किस रूप में देखते हैं ? 
उत्तर : आज जिसे हम भूमंडलीकरण कह रहे हैं वह वास्तव में चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों का और उन्हीं के लिए भूमंडलीकरण हैं. इसे ही हम बाजारवाद भी कहते हैं. भूमंडलीकरण की नीति है “थिंक ग्लोबली ऐक्ट लोकली”. अकारण नहीं है कि सोवियत संघ के पतन के बाद जो वैश्वीकरण आया उसके साथ ही दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श जैसे अस्मिता विमर्शों की अवधारणाएं अचानक उभरकर प्रमुख हो गई. वर्ग संघर्ष कहीं बहुत पीछे छूट गया. लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी अब इतिहास का विषय हो गई. इस ग्लोबल युग में हिन्दी की बोलियों का हिन्दी से अलग और स्वतंत्र होने की मांग भी अस्मिता विमर्श का ही एक हिस्सा है. यह भी एक साम्राज्यवादी एजेंडा है. ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिन्दी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिन्दी का स्थान दूसरा रहता था. हिन्दी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूँढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है. इसी तरह हाल में ही पावर लैंग्वेज इंडेक्स नाम से जारी शोध में हिन्दी को 124 भाषाओं में 10 वां स्थान मिला है और इन 124 भाषाओं की सूची में भोजपुरी, मगही, मारवाड़ी, दक्खिनी, ढूँढाड़ी, और हरियाणवी को स्वतंत्र भाषा के रूप में अलग स्थान दिया गया है जो वास्तव में हिन्दी की बोलियां हैं. साम्राज्यवादियों द्वारा हिन्दी की एकता को खंडित करने के षड़्यंत्र के ये ताजा उदाहरण हैं और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं. आज जब भारत दुनिया के बाजार का एक हिस्सा हो गया है तो स्वाभाविक है जब बाहर का माल आएगा तो बाहर की संस्कृति भी आएगी. बाहर की भाषा के माध्यम से ही प्रवाहित होकर बाहर की संस्कृति घर में आ सकती है. 
पिछले बीस से पच्चीस वर्षों में जिस तरह अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ा है वह अभूतपूर्व है. अंग्रेजों के राज में भी इतनी तेजी से अंग्रेजी का प्रभाव नहीं बढ़ा था. बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भाषा अंग्रेजी के सामने इस देश में सबसे बड़ी चुनौती हिन्दी ही है. यही एक भाषा है जो अंग्रेजी के सामने तनकर खड़ी हो सकती है. इसकी ताकत को खत्म करना है. इसको खंड खंड कर दो. इसकी बोलियों को भाषा बनाकर अलग कर दो. इसकी ताकत अपने आप खत्म हो जाएगी क्योंकि बोलियां ही इसकी ताकत हैं, और बोलियां तो अलग थलग पड़कर खुद खत्म हो जाएंगी. फिर अंग्रेजी का एक छत्र साम्राज्य कायम हो जाएगा. जलते हुए कोयले के ढेर में से एक कोयला अलग निकाल कर रख दीजिए, बहुत जल्दी ही वह ठंढा हो जाएगा. अलग होने पर कौन पूछेगा भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी को? हिन्दी के साथ जुड़े रहने से हिन्दी को जो लाभ मिलता है उसका समान रूप से भागीदार भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी और राजस्थानी भी होती हैं. अलग होने से उनकी क्या हैसियत रह जाएगी? सिन्धी भी तो संविधान में शामिल एक भाषा है कितना महत्व मिलता है उसे? 
वास्तव में हमारा विरोध अंग्रेजी से भी नहीं है. हमारा विरोध उन लोगों से है जिन्होंने अंग्रेजी को शोषण और वर्चस्व का हथियार बना लिया है. जो अंग्रेजी को एक आतंक की भाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं. अंग्रेजी उन लोगों की भाषा है जिन्होंने हमें सदियों तक गुलाम बनाए रखा. वह एक विदेशी भाषा है. वर्चस्व की भाषा है, विभेद और अहंकार की भाषा है. जब हमारे देश का कोई बच्चा आरंभ से ही इस भाषा में शिक्षा लेने लगता है तो वह धीरे धीरे अपनी जमीन से कटता जाता है. अपनी धरती, अपने परिवेश और अपने समाज से उसका लगाव कम होने लगता है. वह अपने को विशिष्ट समझने लगता है. इतना ही नहीं, व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु वह सोचता अपनी भाषा में है. हमारे बच्चों को दूसरे की भाषा में पढ़ना पड़ता है, फिर अपनी भाषा में सोचना पड़ता है और फिर लिखने के लिए दूसरे की भाषा मे ट्रांस्लेट करना पड़ता है. इस तरह हमारे बच्चों का आधा समय तो दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है. क्या दुनिया में कोई देश है जो दूसरे की भाषा में शिक्षा ग्रहण करके महाशक्ति बन पाया है? अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन आदि सभी देशों के नागरिक अपनी भाषाओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करते हैं और हमारे देश में ? लानत है ऐसी आजादी पर, जहाँ न तो हम अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण कर पाते है और न अपनी भाषा में न्याय पा सकते हैं, और उसपर ये बोलियों के झंडाबरदार! 
बहरहाल, हम फिर कहना चाहते हैं कि एक भाषा के रूप में हम अंग्रेजी का सम्मान करते हैं. किन्तु अभिजात्यवर्गीय वर्चस्व के औजार के रूप में हमें अंग्रेजी का विरोध करना ही होगा. हमारी लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से हैं और उसके लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. हम आपस में ही लड़ने लगे तो अंगेरेजी के वर्चस्व से भला कैसे लड़ सकेंगे?
प्रश्न : सारी समस्या की जड़ आठवी अनुसूची है. ‘हिन्दी बचाओं मंच’ इस अनुसूची को समाप्त करने की माँग क्यों नहीं करता? 
उत्तर : ‘हिन्दी बचाओ मंच’ कोई माँग तो कर नहीं रहा. मांग तो दूसरे स्वार्थी लोग कर रहे हैं हिन्दी के खूबसूरत घर को बाँटने की. हम तो यथास्थिति बनाए रखने का आग्रह भर कर रहे हैं. हम अपनी सीमाएं भी जानते हैं. सरकार के लिए आठवीं अनुसूची को हटाना अधिक आसान है कि यथास्थिति बनाए रखना? 
प्रश्न : लेकिन, बोलियों के बहुत से साहित्यकार तो कहते है कि हिन्दी उनके लिए एक साम्राज्यवादी भाषा है जो उन्हें दबा रही है. उनके साहित्य को समुचित प्रतिष्ठा नहीं मिलती.
उत्तर : ऐसे लोगों के दिमाग पर स्वार्थ का आवरण चढ़ा हुआ है. क्या अपने ही देश की कोई भाषा भला साम्राज्यवादी हो सकती है? हिन्दी की प्रकृति सबको साथ लेकर चलने की है. यह ठीक है कि यदि बोलियां अलग हुईं तो हिन्दी का नुकसान होगा किन्तु इससे बढ़कर नुकसान बोलियों का होगा. आठवीं अनुसूची में तो नेपाली, डोगरी सिन्धी आदि भाषाएं भी हैं. कितना महत्व मिलता है उन्हें? भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, अवधी, ब्रजी, अंगिका, मगही, हरियाणवी आदि जब अलग हो जाएंगी तो हिन्दी के नाम पर केवल खड़ी बोली रह जाएगी जो दिल्ली और मेरठ में बोली जाने वाली ‘कौरवी’ से विकसित हुई है. हजार साल की जगह इसका लगभग पौने दो सौ साल का इतिहास बचेगा. इसके साहित्य के इतिहास में न सूर रहेंगे, न तुलसी, न कबीर रहेंगे न मीरा, केवल खड़ी बोली के रचनाकार रहेंगे. हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों की दुनिया कितनी सिमट जायेगी? इतना ही नहीं, आज सूर और तुलसी दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रमों मे पढ़ाये जाते हैं. अगर ये बोलियां अलग हो गईं तो स्थानीय स्तर के विश्वद्यालयों में जहाँ अवधी और ब्रजी की पढ़ाई होगी केवल वहीं ये पढ़ाये जाएंगे. मैं देश भर के विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागाध्यक्षों को लिखने वाला हूं कि वे अपने यहां के हिन्दी के पाठ्यक्रमों में से विद्यापति को हटाएं. विद्यपति को अब हिन्दी के पाठ्यक्रम में रखना असंवैधानिक है. आप ही बताइए, क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए? तुलसी, कबीर, सूर आदि हमारे महाकवियों के साथ यह कितना बड़ा अन्याय होगा ? जो विश्व कवि हैं, वे कुछ जिलों तक सीमित कर दिए जाएंगे. हमारे विद्यार्थियों के साथ भी यह बड़ा अन्याय होगा.
इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थान दिलाने की माँग आज भी लंबित है. यदि हिन्दी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?
अखिलेश जी, एक बात और, स्वतंत्रता के बाद हिन्दी की व्याप्ति हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिन्दी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिन्दी भाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिन्दीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिन्दी का संख्या-बल घटा तो वहाँ की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहाँ हिन्दी के पाठ्यक्रम जारी रखे जायँ या नहीं. इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय अथवा विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.
भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है. 
प्रश्न : जब मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में ले जाने की माँग हो रही थी, तब आप ने यह मंच बनाकर उसका विरोध क्यों नहीं किया था ? 
 उत्तर : अखिलेश जी, क्या हमें एक ही गलती बार बार दुहरानी चाहिए? मैथिली को आठवीं अनुसूची में शामिल करना एक ऐतिहासिक भूल थी. उसी का दुष्परिणाम है कि आज हिन्दी टूटने के कगार पर है. वैसे हमने इसका विरोध तब भी किया था किन्तु हमारी आवाज दूर तक नहीं जा सकी थी. ‘चिन्दी चिन्दी होती हिन्दी’ शीर्षक से एक लेख मैने उन्हीं दिनों लिखा था, और हमें यह भी उम्मीद थी कि हमारी सरकार इस मुद्दे पर बहुत विचार करने के बाद और देश के भाषाविदों और लेखकों से मशवरा करने के बाद ही निर्णय लेगी. यह एक बड़ा निर्णय है. किन्तु हमारा अनुमान गलत निकला. 
प्रश्न : आज दुनिया में जब अनेक भाषाएं मर रही हैं, अनेक मरने के कगार पर है. ऐसे समय उन्हें मान्यता देकर बचा लेने की जरूरत है. किन्तु संरक्षित करने की जगह मरने के लिए छोड़ देने की बात कर रहे हैं आप ?
उत्तर : भोजपुरी मेरी भी मातृभाषा है. मैं भी अपनी मातृभाषा से उतना ही प्यार करता हूं जितना कोई दूसरा मातृभाषा-प्रेमी. प्रश्न यह है कि बँटने से हमारी मातृभाषाएं बँचेंगी या मिलकर साथ- साथ रहने से? भोजपुरी आदि बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग वास्तव में एक इतिहासविरोधी अवधारणा है. दुनिया में भाषाएं सिर्फ मर रही हैं और हर पंद्रह दिन पर एक भाषा मर जाती है. यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया में कुल लगभग 6900 भाषाएं बोली जाती हैं जिनमें से आधी भाषाएं ऐसी हैं जिनके बोलने वालों की संख्या 3000 से भी कम हैं और आने वाले 50 से 100 वर्षों में ये भाषाएं दुनिया से खत्म हो जाएंगी. इसे कोई नहीं रोक सकता क्योंकि इतिहास की सुई कभी पीछे नहीं मुड़ती. अगर हमें बोलियों को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उसके साहित्य को हिन्दी के पाठ्यक्रमों मे शामिल कीजिए, उसमें साहित्य और संगीत रचिए, उसमे फिल्में बनाइए, उसके शब्दों, भाव-छवियों, मुहावरों आदि से हिन्दी को समृद्ध कीजिए- रेणु और नागार्जुन की तरह. उसे हिन्दी से अलग करके अल्पसंख्यक और मरने वाली भाषाओं की श्रेणी में मत ढकेलिए. हमें अपनी बोलियों की विरासत को बचाना है, हिन्दी से जुड़ी रहकर ही उसकी बोलियाँ बच पाएगी और इससे हिन्दी भी समृद्ध होगी. अंग्रेजी को देखिए, वह दूसरी भाषाओं के शब्दों से ही बनी है. अंग्रेजी में 72 फीसदी शब्द तो सिर्फ लैटिन के हैं. हमे उससे कुछ तो सबक ले सकते हैं? 
दूसरी बात यह कि जिन मरने वाली बोलियों को मान्यता देकर संरक्षित करने की बात कर रहे हैं उनमें तो वही हैं जो ताकतवर हैं. आप भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, ब्रजी, अवधी और हरियाणवी की मांग तो कर रहे हैं किन्तु मेवाड़ी, मेवाती, बुन्देली, सरगुजिया, हालवी आदि अपेक्षाकृत छोटी और कमजोर बोलियों की बात क्यों नहीं करते? क्या आप जानते हैं कि जिस छत्तीसगढ़ी को छत्तीसगढ़ में राजभाषा बनाया गया है और उसकी मान्यता की माँग की जा रही है उस छत्तीसगढ़ी में 96 बोलियाँ हैं. जिस राजस्थान की राजस्थानी की मान्यता की मांग की जा रही है वहां की 74 में से सिर्फ 9 ( ब्रजी, हाड़ौती, बागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी) बोलियों को राजस्थानी नाम देकर संवैधानिक दर्जा देने की मांग की जा रही है. बाकी बोलियों को मरने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया जा रहा है. क्या इसलिए कि वे कमजोर हैँ? यह कहाँ का न्याय है? कि जो ताकतवर है उसे तो और आगे बढ़ने का अवसर दो और जो दबी कुचली हैं उन्हें मरने के लिए छोड़ दो उनकी हाल पर.

प्रश्न : ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ आपकी महत्त्वपूर्ण किताब है. प्रशासनिक शब्दावली की तरह आलोचना में पारिभाषिक शब्दावली की महत्ता को किस तरह रेखांकित करते हैं आप?
उत्तर : प्रशासनिक शब्दावली से आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली की तुलना नही की जा सकती. मैं लम्बे समय तक विश्वविद्यालय में आलोचना और काव्यशास्त्र पढ़ाता रहा. अध्यापन के दौरान मेरा ऐसे पारिभाषिक शब्दों वे बराबर सामना होता रहा जिनके प्रामाणिक अर्थ के ज्ञान के लिए इधर –उधर भटकना पड़ता था और उनमें से अधिकाँश के अर्थ की विश्वसनीयता पर संदेह बना रहता था. हिन्दी में ऐसे पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या करने वाले सिर्फ दो ग्रंथ उपलब्ध थे – एक डॉ धीरेन्द्र वर्मा और उनके सहयोगियों द्वारा संपादित ‘हिन्दी साहित्य कोश’ भाग-1, और दूसरा डॉ. बच्चन सिंह द्वारा प्रणीत और सन् 1983 में प्रकाशित ‘हिन्दी आलोचना के बीज शब्द’. डॉ. बच्चन सिंह की पुस्तक में लगभग अस्सी शब्दों की व्याख्य़ा की गई है जबकि हिन्दी आलोचना जगत में प्रचलित पारिभाषिक शब्दों की संख्या कई सौ हैं. जाहिर है यह पुस्तक हिन्दी साहित्य के अध्येताओं की जरूरत पूरी नही कर पाती थी. इस दृष्टि से ‘हिन्दी साहित्य कोश’ निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है. इस ग्रंथ को तैयार करने में 96 विद्वानों का सहयोग लिया गया था जो अपने- अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे. इस दृष्टि से इसकी प्रमाणिकता असंदिग्ध है. किन्तु इसका प्रकाशन सन् 1958 में हुआ था. उसके बाद हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में पारिभाषिक शब्दों की एक बड़ी संख्या ग्रहण की गई है जिनका उल्लेख इस ग्रंथ में नहीं है. ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ इस बड़ी कमी को पूरी करता है. मुझे संतोष है कि आशा के अनुरूप इस ग्रंथ का भरपूर स्वागत हुआ है. वर्ष 2008 में पहली बार यह पुस्तक छपकर आई. अगले ही वर्ष संशोधित संस्करण आया और तबसे इसके कई संस्करण छप चुके हैं.
प्रश्न : ‘हिन्दी जाति’ किताब के जरिये आप क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर : ‘हिन्दी जाति’ पुस्तक वास्तव में हिन्दी समाज में जातीय चेतना के विकास के उद्देश्य से लिखी गई है. हिन्दी क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ वेद, उपनिषद, गीता और रामायण का प्रणयन हुआ. जहाँ राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर हुए. जहाँ नालंदा जैसा विश्वविद्यालय था जिसमें चाणक्य जैसे शिक्षक थे. जहां मगध, पाटलिपुत्र और इंद्रप्रस्थ जैसे शासन के केन्द्र थे. जहाँ काशी और प्रयाग जैसे विकसित संस्कृति के केन्द्र थे. जहां गंगा, यमुना, सरयू और नारायणी जैसी नदियां चिरकाल से अनवरत प्रवाहित हैं. जहां चंद्रगुप्त, अशोक और अकबर जैसे शासक हुए. जहां तुलसी, कबीर, सूर और मीरा जैसे संत हुए. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि दुनिया की किसी भी संस्कृति से मुकाबला करने के लिए हिन्दी क्षेत्र से तीन नाम ले लेने की काफी हैं- तानसेन, तुलसीदास और ताजमहल. किन्तु इतनी समृद्द विरासत के बावजूद आज हिन्दी क्षेत्र सबसे पिछड़ा क्षेत्र है, इसे इतिहासकारों ने गोबरपट्टी ( काउ बेल्ट ) कहा है. 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार हिन्दी क्षेत्र के अधिकाँश राज्य सबसे पिछड़े पायदान पर हैं. बिहार की साक्षरता 63.8 प्रतिशत के साथ सबसे नीचे है. 
इस पिछड़ेपन का कारण क्या है? यहां अच्छी खेती है, जंगल हैं, खनिज हैं, जमीन में उर्वरा शक्ति है, लोग मेहनती हैं, तो आखिर कारण क्या है? बहुत से कारण हैं किन्तु इसका मुख्य कारण है जातीय चेतना का अभाव. बंगाल में रहने के कारण इस सच्चाई को मैं अधिक सहजता से समझ सका क्योंकि बंगालियों मे यह जातीय चेतना काफी विकसित है. इसीलिए शायद सांस्कृतिक दृष्टि से बंगाली समाज हिन्दी समाज की तुलना में काफी आगे बढ़ा हुआ है.
‘हिन्दी जाति’ पुस्तक के प्रणयन का उद्देश्य अपने हिन्दी समाज में जातीय चेतना को विकसित करना है ताकि हमारे समाज के लोगों में अपनी जातीयता के प्रति गौरवबोध हो सके. हिन्दी क्षेत्र आज जाति- प्रथा और साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बना हुआ है. जातीय चेतना विकसित करके साम्प्रदायिकता और जाति प्रथा जैसी कुरीतियों से निर्णायक लड़ाई लड़ी जा सकती है. मुझे खुशी है कि मेरी इस पुस्तक का भी भरपूर स्वागत हो रहा है. 
प्रश्न : हिन्दी भाषा भाषी लोगों को आपका संदेश ?
उत्तर : अपने भीतर जातीय चेतना विकसित करें और हिन्दी का समृद्ध घर टूटने से बचाएं. अधिकाँश समस्याओं का हल इसी से संभव है.